जिसकी कोई जात नही
धर्म का जिसको अभिमान नही
वर्ग- भेद के बीच की खाई में खिला
नफरतों में पलता है जो .....
अपने होने का एहसास
कराता है जो पल में
होठों पर बिखरता है
मोतियों की तरहा,
पाषाण भी पिघलता है बर्फ की तरहा,
वो जो है... दिलों में एक सा
वो है तो सब कुछ है,
उसके न होने से कोई नही है.....
हर हृदय के बीच स्पंदन है वो ,
वो... प्रेम ...जो कहता है
हार जाओ ये दुनिया
जीत कर इक दिल ....
-संगीता
धर्म का जिसको अभिमान नही
वर्ग- भेद के बीच की खाई में खिला
नफरतों में पलता है जो .....
अपने होने का एहसास
कराता है जो पल में
होठों पर बिखरता है
मोतियों की तरहा,
पाषाण भी पिघलता है बर्फ की तरहा,
वो जो है... दिलों में एक सा
वो है तो सब कुछ है,
उसके न होने से कोई नही है.....
हर हृदय के बीच स्पंदन है वो ,
वो... प्रेम ...जो कहता है
हार जाओ ये दुनिया
जीत कर इक दिल ....
-संगीता