Tuesday, 17 July 2018

मन में आया

कदमों को रोकता था
मन को खींचता था
मुड़ जाना चाहती थी उम्मीदें मेरी
लौट जाती थी तरंगें सभी
जान गई उसको
पहचान गई उसको
वो, कोई और नहीं
राह का काँटा था.....
                           -संगीता

Monday, 16 July 2018

राह...

चलती रही सपनों की राह पर
नन्हे-नन्हे कदमों के भारीपन बढ़ता रहा
थम गई सीमा पैरों के बढ़ने की
पर, कदम रुकते नही
खींच लेती हूँ आँख पर पड़े पर्दे
हार की हर राह में
ओढ़ लेती हूँ उम्मीद की चादर
कालिमा के बीच उड़ता है
कोई, जुगनू सा
तोड़ लूँगी एक दिन
सब्र का वो फल
विश्वास मेरे साथ बस
चलता रहे..…..
                      -संगीता

उसने कहा

रात भर  चाँदनी के बीच वो
बिखरा रहा,
घिर कर काली घटाओं में
मनभर वो
बरसता रहा ,
प्यासी धरती को भी
बूँद -बूँद से भरता रहा ,
कह रहा वो आज मुझसे
प्रेमपथ में हूँ खड़ा ....
बाँध लो अलकों में तुम
या छोड़ दो उस राह में
तुम्हारे लिए जिस राह मैं बढ़ता रहा....
हूँ कालिदास की उपमा सा मैं बिखरा पड़ा
संसार भी इस मेघ से मुख मोड़ता ही रहा....
                                                       -संगीता

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...