कदमों को रोकता था
मन को खींचता था
मुड़ जाना चाहती थी उम्मीदें मेरी
लौट जाती थी तरंगें सभी
जान गई उसको
पहचान गई उसको
वो, कोई और नहीं
राह का काँटा था.....
-संगीता
मन को खींचता था
मुड़ जाना चाहती थी उम्मीदें मेरी
लौट जाती थी तरंगें सभी
जान गई उसको
पहचान गई उसको
वो, कोई और नहीं
राह का काँटा था.....
-संगीता