Wednesday, 31 January 2018

मेरे प्राण

वह मुझे लिखता रहा
पर ,अभिव्यक्त न किया
शब्द -शब्द से मेरी आत्मा
खरोंचता रहा ....
नोंकदार कलम भी
शूल से चुभते हैं...
काट सकता था वो मुझसे
कालिमा के अम्बार को
मेरे प्राण को वो
मुझसे हरने लगा
                    -संगीता

Tuesday, 30 January 2018

नीम से
तेरे शब्द
और...मेरा
शहद सा प्रेम
मैं थोड़ा सा नीम
चख कर
शहद भर देती हूँ
 अनगिनत पुष्प परागों
से निर्मित मैं..
कहीं -कहीं मिलती हूँ
सर्वत्र तुम...
                 संगीता

खुद को

धरती गोल है
आज समझ आया ...
विस्तार पाने के लिए
खुद को उठाया
अनंत की गोद में
सब, तुच्छ नजर आया
कण-कण की विशालता
जब ,
दृष्टि परख पाया..
                     -संगीता

Sunday, 28 January 2018

कर नही सकती...

चाहती हूँ
दिल खोल कर रख दूँ
उसके सामने
पर वो
कहीं...
ठोकर न मार दे
डरती हूँ
उससे भी बड़ा
डर है मुझे
वो ...मुझे
समझेगा नही
जो भी हूँ... मैं
दिखा नही सकती
खुद की बिगड़ी
छवि ...
सुधार नही सकती
और...
न जाने कहाँ से
भर आती है
नफ़रतें
जिन्हें ...
जितना भी चाहूँ
निकाल नही पाती..
और ....घिर आती हूँ
शक के घेरे में
जिसे मैं....
               -संगीता

वो ऐसा करता है.....

कभी वो मेरे
अतीत के
गहन गुफाओं के अँधेरों में
चहलकदमी करता है....
कभी वो उन्हीं
अतीत के चलचित्रों में
खुद को पाता  है....
खुशी और गम के आँसुओं को
हंस सा... वह
सुख का सुख
और .....दुःख का दुःख
अलग करता है
अपने ही दिए
अन्तर्घातों को .....
खुद ही सहलाता है
और कभी वो ...
कुशल कवि सा
मेरे शब्दों को
चुराता है.....
मेरे कुछ रिसते घावों पर
वो....
औषधि लेपन भी  करता है
और बीच -बीच में
मेरे दर्द से
खुद कराह उठता है
इतनी तकलीफ....
उसे कभी न होती
गर.....
वो जान लेता
सबकुछ
जो ...उसे
मन की आँखों से नजर आता...
खण्डित मनमूर्ति
के लिए ...अब
एक रिक्तता सी
होती है ....
जब भी
वो ...
कुछ कहता है...
                    -संगीता


सुन सकोगे....

जब भी मैं तुम्हें
आवाज लगाती हूँ
मेरी आवाज
तुम्हारे कानों को
छू कर निकल जाती है
और तुम,
अपने में ही  रमे हुए
मेरी हर आवाज को
बिना सुने निकल जाने देते हो
उसे रोककर
कभी सुनने की
कोशिश भी नही करते
मेरे हर शब्द में
तुम थे ,
मेरे दिल से निकली आवाज
सिर्फ तुम तक जाना चाहती थी
पर ..तुमने
उन स्वरों को
अनन्त में भटकने के लिए
छोड़ दिया ...
मेरी हर ध्वनि ,
प्रतिध्वनि के रूप में
न जाने ...
तुम तक कब पहुँचेगी
तुम इंतजार कर सकोगे ....?
सदियों तक ...
उन स्वरों को
सुनने के लिए
काश तुम सुन लेते ...
मेरा हर स्वर
छूटने से पहले .....
                          संगीता
                         

Saturday, 20 January 2018

कुछ विचार यूँ ही कौंध जाते हैं।

दर्पण के सामने खड़ी मैं .....न जाने किस दुनिया में चली जाती हूँ ....और  जाने क्या मन में आता रहता है,जो गलत भी नही होता है...... दर्पण के पीछे न जाने कितने राज छिपे होते हैं दर्प को दिखाता दर्पण सामने से जितना  दिखाता है उससे कहीं अधिक वह देखता है।उसके समक्ष हम बाहर -भीतर से खुल जाते हैं हमारे हर रूप का प्रथम द्रष्टा दर्पण ही होता है, जो ,वो सब कुछ देख लेता है जिसे हम दुनिया भर से छिपाते फिरते हैं।हमारी अनगिनत  खुशियों के पल उसमे कैद होते हैं, तो अनगिनत आँसू भी वही छुपा कर रखता है। हम अपना जीवन जीते हैं और दर्पण के सामने जाते ही दर्पण हमारा जीवन जीने लगता है .......जितनी भी देर हम उसके सामने रहें,वह हमसे सब उगलवा ही लेता है ...हम भले किसी को न बताना चाहे वह हमारी आँखों में गहरे उतर कर मूंगे मोती शंख उठा लाता है...... पर परम विश्वासी सा वह किसी से कुछ नही कहता है।असंख्य रहस्यों के साथ हर किसी का होकर रहता है।
                                                                                            -संगीता

Sunday, 14 January 2018

'काश दिख जाता सबकुछ '

शरीर पर इतने गहरे घावों को
तुम देखते नही,
कैसे  दिखाऊँ ...वो घातें
जो ,मन पर लगी हैं
इतने गहरे जख्मों पर ,
फिर जख्म बढ़ा देते हो
मन तक तो ,
तुम... कभी पहुँचते नही ,
सोंचती हूँ ,
मन को स्वर मिल जाता ,
तो.....
उसकी आवाज कैसी होती
जो कुछ ,मेरा मन जानता है
मेरा मन झेलता है,
वो ....सारी बातें ...
वो ,
खुद कह पाता ,
काश ऐसा होता .....
तो,तुम सुन पाते
उसकी चीख,
उसकी दमघुटी आवाज़,
उसके भीतर जमे
वो,
अवसादों के पहाड़,
मन के आईने पर ,
परत पर परत चढ़ती धूल ,
तुम ,सब जान जाते ,
कि, मेरा मन
कितनी बार मर कर....
जी उठता है,
एक बार फिर मरने को ..
तैयार...है ,वो
एक बार फिर ,
तुम उसकी हत्या करोगे...
जिसके लिए ...,
संसार भर में ...
किसी 'दण्ड 'का विधान नही है
तुम हर बार ...
बाइज्जत बरी ,
और मैं...
हर बार ....
सजा की हकदार...
मेरे मन को ...
काश..... तुम छू लेते
अपने मन से....
                      -संगीता
     






Saturday, 13 January 2018

सुलझेगा ....!

उलझनें मन की ....
सुलझाने से
और ,भी
उलझने लगी हैं
वो भी,
निर्जीव सी पड़ी
उन स्मृतियों में
जिन्हें  स्मरण में लाना भी,
कष्टदायी है,
कितनी ही गाठें ,
मन के धागे में
पड़ती जा रही हैं,
आराम -आराम से ,
बचा- बचा कर ,
एक -एक धागा खोलने में
कितनी ही रातें गुजर जा रही हैं,
कुंठाओं के ,
बनते ढेर,
पहाड़ की शक्ल में ,
खुद को ,
छोटा ,बना रहे हैं ।
कहते हो तुम बार -बार,
सुलझ जाएँगी ये उलझनें,
पर,
वही उपक्रम ,
बार- बार.......
सुनो...!
कहीं .....ये उलझनें ,
तुम्हीं से तो नही....?
तुम्हारा हर शब्द,
मन के धागे से,
चिपक जाता है,
 और बढ़ा देता है....
मेरी उलझन...
मन की डोर का ,
एक छोर....
तुम्हारे पास जो है...
                       -संगीता




Friday, 12 January 2018

"चिंतन करना होगा "

जब हम किसी व्यक्ति पर विश्वास करते हैं ,तो वह व्यक्ति हमारे लिए सबसे प्रिय होता है।उसके हर बात पर ,हर व्यवहार पर खुद से ज्यादा विश्वास करने का मन होता है ,भले ही उस व्यक्ति की वास्तविकता कुछ भी हो  ,उस ओर हमारा ध्यान नही जाता ,हम तो उसे स्वयं के जैसे निष्कपट ही मानते हैं।व्यक्ति अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करने में कभी -कभी असमर्थ हो जाता है ,उसे चाहिए होता है एक ऐसा समर्थ स्कन्ध जिसपर संसार की हर प्रकार की समस्याओं से परे होकर सर टिका सके । निर्लिप्त भाव से उसके समक्ष अपना हृदय आवरणरहित कर सके.... कुछ लोगों को ऐसे सभ्य मिल भी जाते हैं ....पर उनका उत्तरदायित्व जीवनभर का रहता है ....सामने वाला व्यक्ति भले ही विश्वास करे न करे उस व्यक्ति को अपने पर किए गए विश्वास को खण्डित नही करना चाहिए।कोई व्यक्ति कुछ समय बाद यदि विश्वास की शिला पर टिका नही मिलता तो उसपर पुनः विश्वास करना स्वयं के प्रति अन्याय करना होगा यदि हम ऐसा करते हैं ,तो हम स्वयं को दण्डित करने का उपक्रम करते हैं ....ऐसे व्यक्तियों से दूरी बनाने का एक मार्ग ....उस व्यक्ति पर फिर कभी विश्वास न किया जाए ....भले ही उसे आपका सामीप्य प्राप्त हो पर उसे आपकी निकटता का ,आपके दुःख का आभास भी न हो ।आपके पास आपसे बढ़कर कोई दूसरा  नही जो आपके आत्मबल को बढ़ा सके ।धैर्य के साथ ........पूर्णतः विखण्डित
हृदय को सबल बनाने का एक ही मार्ग है .....स्वयं को क्षणिक प्रसन्नता के अवसर से दूर न रखना।आप जितने ही प्रसन्न होंगे ,अविश्वासी को उतनी ही भली प्रकार से दण्डित कर पाएंगे ....पुनः न मिलने वाले जीवन को ऐसे अविश्वासियों के स्पर्श से स्वयं को धूमिल न मानकर ,प्रसन्नता को अपनी शक्ति  बनाने में ही जीवन का मर्म है।                                                                                                                                                                        -संगीता
                                                                                                                                   

Thursday, 11 January 2018

कभी महसूस करना ...

किसी के प्रेम की
मधुसिक्त वाणी में ,
खुद को सराबोर कर,
किसी के रूद्र रूप की
विकरालता में ,
खुद को ,
प्रस्तुत कर,
किसी की ,
दिव्यता में,
खुद को पुंजीभूत कर,
किसी के रुँधे गले से ,
निकलते ,
कम्पित स्वर को ,
किसी की प्रार्थना में,
खुद को ,
पूर्णतः पाकर,
किसी के ,
स्निग्ध  स्पर्श को
खुद पर ,
अनुभव कर,
किसी की ,
नफरत से
खुद को
निकाल कर ,
किसी की ,
ध्वनि में
खुद के
गीत को ,
कभी फिसलती जमीन पर
खुद को
रोककर,
किसी के
सौ सवालों का
एक जबाब होकर .....
क्या पाया....?
               -संगीता




Wednesday, 10 January 2018

सब यहीं है...

जिंदगी को ..
सीधी -साधी दुनिया में
जन्नत बनते देखा है मैंने
मन  न जाने कब ,
बादलों के पार झाँक आता है,
और कभी,
स्वर्णिम आभा के साथ
अटखेलियाँ करता है,
अनियंत्रित सा मन
घूम आता है ,
पूरा जहाँ ,
पल भर में
और ,
भर देता है
पल भर में
खुशियों की झोली
ऐसे मनचाहे जन्नत को
जहन्नुम बनते भी
देखा है,
जब,
मन किसी और की
गुलामी करता है
घुट -घुट कर ,
खुशियों का
गला घोंटता है,
आइने में ,
खुद की
पीली पड़ी ,
काया को ....
अजनबी सा देखता है
खुद के बनाए
ताने -बाने में उलझ कर,
अपने आँसू पोछकर
खुद ही मुस्कुराता है
रोक कर रखता है
जज्बातों का समन्दर
इन सब के साथ भी ,
बड़ी अजीब बात
वो ,
उससे,
 निकलना नही चाहता है ,
उस जहन्नुम के पार की,
हँसी दुनिया,
देखने का जज्बा
किसी -किसी में
होता है....
                   -संगीता



तुमने नही कहा था ...

दुनिया के रीति -रिवाजों को
दरकिनार कर आई ,
राहों में फैले लोभ मोह 
सब छोड़ -छाड़ कर आई,
निर्झरिणी सी बहकर 
कितनी ठोकर खाई ,
तुम्हारे फीके रागों ,पर भी
  सुरलहरी सी छाई                       
 प्रतिपल तुमसे नेह बढ़ाया
मधुर -मधुर मुस्काई ,
कितने बसन्त थे बीत गए 
जब ,तुमसे मिल पाई,
पुरइन पात पर ,
मोती सी ढलकी 
कितने पास तुम्हारे आई ,
तुमने,
एक क्षण में ही ,
बोल दिया-
"किसने कहा था "
मैं अवाक् सी ,
बस , इतना ही कह पाई ,
पता नही ....
                    -संगीता

Tuesday, 9 January 2018

तुमने पूछा ही नही

राह दर राह मैं बढ़ती रही ,
तुम्हें छोड़ कर
सब पाती रही
तुम्हारे जबाब लिए
कबसे खड़ी रही
पर ,
तुमने पूछा ही नही....
धमनियों में धुँए भर गए हों ,जैसे
तुम्हारे अरमान सुलगने से
तुम्हारी हर आहट
दम घोंटना चाहती है
ऐसा क्यों है ...
तुमने कभी ,जाना ही नही
तुम्हारे गमगीन पलों को ,
तुम्हारे वजूद के ,
हर पहलू को
खुद पर ,आजमाया मैंने
तुम्हारी हर ,समझ को
समझती रही
पर,
तुमने समझा ही नही
दुनिया की भीड़ में
एक, तुम दिखे मुझे
तुम्हें ,सब छोड़ कर
बेपरवाह हो ,
अपने गले लगाती रही
पर, तुमने भी
 मुझे समझा ......
तो ....सिर्फ
गले की .....फाँस...
जो तुम्हारे हिसाब से
कभी खुली नही.....
                        -संगीता


Monday, 8 January 2018

क्या कहूँ...

जैसे,मेरे सर पर
सूरज आ खड़ा है
कि, बौनी होती परछाइयाँ
सिमट गई हैं,
पैरों में.....
गर्म तवे सी,
तपती जमीन
पर,
कोई पौधा ,
अचानक-
 मुस्कुराता नजर आया हो ,जैसे
उसके नन्हे पत्तों की ,
छतरी में, आने को आकुल मन
उलझ कर रह गया,
और, तपने लगा
धरती के साथ ...
फिर ,बौनी परछाइयों ने
अपना रुख बदला
और,
मुझे स्थिर छोड़
बढ़ने लगीं.....

                -संगीता



गुनगुनाओ...

चेतना का राग
तुमने सुना है क्या ..
अपने अन्तर्मन की
गम्भीर भंगिमाओं में
कोई खींचता है तुम्हें,
अनुभव किया क्या-
 उसकी  उपस्थिति का ....
वो कोई और था ,
जो,
तुम्हें भरमाता था ,
तुम उस तक नही पहुँचे,
जो,
तुम्हें राह  दिखाता था ,
तुम्हारे अधरों पर ...
जो ,
साक्षात् रहता था ,
तुमने उसका ,
कोई गीत न सुना
सृजन के साथ ,
उसका है नाता
उसकी डोर ....
अनन्त की ओर हैं जाती,
उस ओर ...
कोई और नही ...
तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब है
तुम्हारी चेतना
जिसे गाती है ,
गुनगुनाती है....
              -संगीता

Saturday, 6 January 2018

जाने कब ...

दर्द तो दिल में था
चेहरे पर कब आ गया
जो तुमने पढ़ लिया ,
चुपके से
कब आँसुओं को पीते हुए ,
देखा तुमने ,
मेरी आँखों में जो ,
आया न था ,
तुम किस मुद्दत की बात करते हो -
जो पल कभी
तुम्हारा न था ,
सब कुछ सुन लिया तुमने
मेरे कहे बगैर,
मेरे मुख से ,तो
कोई स्वर फूटा न था ,
तुम,  मरहम लिए
खड़े रहते हो ,
मेरी राहों में ....
राहें जख्मी करेंगी,
जानते हो जैसे -
मेरे हृदय तल तक
टटोल आते हो ...
मुझसे पूछे बिना ,
जानना चाहते हो ,
मेरी हर बात ,
पढ़ना चाहते हो,
 मेरे जीवन का हर पन्ना
मेरे होठों की
इंच -इंच मुस्कान
का ,माध्यम
बन जाना चाहते हो तुम
दूर से ही सही,
पर तुम,
मुझमें ही रहना चाहते हो
मुझमें ही
रम जाना  चाहते हो
कितनी शिद्दत है
तुम्हारी चाहत में
बिना कुछ कहे ,
सब कुछ ,
करना चाहते हो,
अनजान हूँ तुमसे
तुम्हारी मौजूदगी से मैं
पर तुम,
दरिया की हर मौज की तरह ,
हर पल
मौजूद रहना चाहते हो ...
क्यों मेरे लिए ,
आसमान समेटना चाहते हो ...
                                   -संगीता



कोई तो सुने.....

करती हैं मनुहार ,
ये ,ऋतुएँ बार -बार
कोई तो सुने....
हर रूप में 
हर साज में,
खड़ी हैं ,
कबसे
राह में,
उत्स हैं, ये ही 
जिसके आनंद का 
इनसे ही देवत्व,
इनसे मुख मोड़ता
हठधर्मी ये मानव
करता है प्रहार
प्रकृति के ममत्व पर,
विमुखता की पराकाष्ठा पर
आसीन ये ,
मनुवंशी
पुकार नही सुनते 
कोमल हृदय का 
कबतक करेंगी,
मनुहार ,ये ऋतुएँ
छीन लेंगी,
 सबकुछ
जितना भी दिया,
मूल में है ,जो..
रहस्यमयी रश्मियां
उनका आकर्षण
चुम्बकीय स्पर्श
तुम्हें ,
मिलेगा......?
                 -संगीता



Friday, 5 January 2018

विकट हो तुम....

हर रोज ,
तुम एक नई ऊर्जा
कहाँ से लाते हो ...
कि,
उखड़ने लगते हैं
पाँव मेरे
अपनी मेहनत की जमीन से ,
कितने लम्बे हैं ,
तुम्हारे हाथ
जो,
खींच लेते हो मुझे
उपलब्धियों की  ओर से
क्या चाहते हो मुझसे
कितना चाहते हो मुझसे
कुछ तो सरलता से कहो...
कि,
समझ पाऊँ.... तुम्हारी भाषा
कितने विकट हो तुम
तुम्हारी राह ...में
कण्टक कितने हैं ...?
सफलता की राह ,
तुमसे होकर ही जाती है...
तो,
बताओ मुझे
खुद को कितना तपाउँ
कि,
कुंदन बन जाऊँ
कि ,तुम भी
मेरी मंजिल के पास
मुझे मुस्कुराते हुए मिलो
और ,
मैं कहूँ तुमसे
मुस्कुराते हुए,
गुजर गई मैं...
तुमसे होकर,
पा लिया मैंने
जो ,
पाने की चाह थी ...
                       -संगीता

Thursday, 4 January 2018

कविता

मधुप की गुंजार सा जो
 घुल रहा था कान में ..
आज उसने ..
विष की बूंदे
घोल दी संसार में
हो समर्पित स्नेह से
झुक गया था....जो राह में
आज बन अवरोध सम
बिछ गया है ,
मार्ग में ....
अवसाद की चट्टान पर
कितने परत उसी से हैं,
वो आज भी ,
कुंठित भाव से
ढेर बनाता है ....
दुर्विचार के ,
त्राहि- त्राहि करते....
 मन- प्राण
जिसके होने से झुलसते हैं
अग्नि के ताप  सम
उसकी महिमा,
अदृश्य दाहक शक्ति
जलाती है देह ...पर,
मरती है सम्वेदना
यह ....द्वेष
यह ....ईर्ष्या
नही ,दिलाते मुक्ति
बिना ....त्याग के
                   -संगीता





अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...