Friday, 29 May 2020

आजकल...

हवाओं में
 हर तरफ कुछ घुला सा है।
जो धीरे -धीरे ,
बना रहा है एक घर ,
घास -फूस,ईट पत्थर का नही
डर और दहशत की परत दर परत
जमती धूल का ।
               -डॉ०संगीता

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...