Friday, 25 June 2021

कुछ बातें..11

कोई इंसान चाहे स्त्री हो या पुरुष जब किसी को बेहद चाहने लगता है, तो,वह उसे अपने आँखों से ओझल नही होने देना चाहता।वह चाहता है कि दिन- रात उसपर नजर रख सके।उसके अपने जीवन को भी वह अपनी जिंदगी का वह हिस्सा समझने लगता है,जो उसका होता ही नही।उसके व्यक्तिगत जीवन में इतनी गहराई से समा जाता है कि उसे उसके जीवन से दूर कर देता है।उसके अतीत ,वर्तमान की हर परत को खोलकर देखना चाहता है।बार -बार परवाह और प्रोटेक्शन की सारी हदें पार करने को ही वह प्यार समझता है।होता भी यही है, और होना भी चाहिए,किसी प्रेमी को और क्या चाहिए होगा भला।प्रेम के मानक भी तो ऐसे ही गढ़े गए हैं।प्रेम करने वाला हर व्यक्ति प्रेमी को ही सबकुछ मान लेता ,उसे ईश्वर का दर्जा भी दे देता है, उसकी हर खुशी को अपनी खुशी मानकर चलता है। कितने खुशनसीब होते हैं वो लोग जिन्हें इतना प्यार मिलता है। इतना नही तो आधा ही सही,आधा नही तो झूठा ही सही। असीम प्रेम करने वाला हमेशा ही यह चाहता है कि जब भी वो किसी के बेहद प्रेम में पड़कर उसे अपने अपनी आँखों के सामने दिन- रात बिठाए रखता है।उसके अतीत में वहाँ तक झाँक आना चाहता है ,जहाँ तक किसी और की नजर न पड़ी हो।उसके वर्तमान की हर गतिविधियों को अपनी ही गली में होता हुआ देखना चाहता है, भविष्य में किसी और को उससे जुड़ता देखना नही चाहता।तो ,इसमें गलत क्या है ,हम यही कहेंगे कि यह तो प्रेमी का जन्मसिद्ध अधिकार हुआ, जो इतना न करे वह प्रेमी किस काम का....पर,जरा सा सोचने वाली तो बात है ही, कि जब हम उपर्युक्त सब कर रहे होते हैं ,तो हम कितना कुछ उससे छीन रहे होते हैं।सबसे पहले तो उसकी अपनी इच्छा,उसका अपना विचार,उसकी अपनी पहचान,उसकी अपनी अभिव्यक्ति, उसका अपना आत्मसम्मान, उसकी गरिमा,उसके जीवन का हर एक सपना जो प्रेम में पड़ने से पहले की होती है।अपने पार्टनर को उसकी जिंदगी और उसकी खुशी से दूर कर देना प्रेम का कौन सा अनोखा रूप हो सकता है...?अगर हम वास्तविकता देखें तो हर कोई स्वतंत्र रहना चाहता है।हम स्त्री हों या पुरुष यदि हमारा पार्टनर हमारी बाहों में,प्रेम के बंधन में, मुक्त नही महसूस करता तो हम सच्चे प्रेमी नही।प्रेम जब पराकाष्ठा पर पहुँचता है तो प्रेम आध्यात्म का रूप लेने लगता है।पर,यही प्रेम यही दिशाहीन हो जाये तो प्रेमी को पल-पल यातनाओं के गर्त तक ले जाता है। उसके मन को अवसाद से भर देता है, जो कभी खाली नही होता।प्रेमी को मुक्त रखने का सामर्थ्य ही प्रेम है। -मेरी ही कलम से(डॉ० संगीता)

Thursday, 24 June 2021

कुछ बातें...9

बातें... न जाने कैसी-कैसी,एक छोटा सा मुंह है, उसमें एक प्यारी सी जीभ जिसकी हरकतें मन के भाव समझकर आवाजें होठों से बाहर कर देती हैं।बातें एक ऐसी राह पर चलती हैं जो मुड़ कर वापस होठों तक नही आतीं।जैसे राहें गायब होती रहती हैं।पर,ये गायब होती राहें किसी-किसी के दिल में घर कर लेती हैं।एक ऐसा घर जो खुद तो मजबूत से मजबूत बनती जाती हैं पर ,साँसों को कमजोर करती रहती हैं।यही कमजोर साँसे मनुष्य को भी तन मन से कमजोर बना देती हैं, कि कोई भी गहरी बात हावी होने लगती है।स्थितियाँ तब और भी गम्भीर हो जाती हैं ,जब ये बातें किसी और तक नही जा पाती हैं।यही बातें ही अवसादों के वो चट्टानी भूमि तैयार कर देती हैं कि फिर कभी बादल की बूंदें उसे सरस नही कर पातीं। अवसादों से घिरा व्यक्ति बात-बात पर मुस्कुराता है, हँसता है ,पर खुश नही हो पाता।बहुत कोशिश करता है वह कि लोगों से बातें करे,खुश रहे पर,उसके भीतर पसरी वीरानियाँ उसे दिन ब दिन जर्जर करती रहती हैं।खुशियों का न मिल पाना दुखी नही करता बल्कि खुश रहने का दिखावा करना बहुत दुख देता है।खिलखिलाती आँखों का सूनापन कोई भाँप नही पाता।इन सब का कारण शायद हमारी महत्वाकांक्षाएं होती हैं ,ये चाहना बड़ा ही घातक होता है।जब इंसान के पास वो सबकुछ होता है ,जो जीने के लिए काफी होता है।पर ,सच यह है कि,यही सिर्फ काफी नहीं।लोगों की भीड़ बस मन के बाहर ही होती हैं।जब तक इंसान मन से खुश नही होता तबतक उसे कोई भी बात खुश नहीं कर सकती।कितना मुश्किल होता है खुश रहना और कहना आसान "मैं खुश हूँ"... -मेरी ही कलम से

Wednesday, 23 June 2021

कुछ बातें...8

रात बड़ी ही विचित्र सी लगती है, और एकांत में रात अपनी ही खुमारी में रहती है।ऐसा लगता है वो किसी बेचैन को पाकर और भी विकल हो उठती है, तभी तो वह जगाना चाहती है अपने अंतिम अंधेरे तक।आधी रात में जुगनुओं से फैले तारे पूरे आकाश को भर देते हैं, पर मन का कोना -कोना खाली सा लगता है,और ये खालीपन तब ज्यादा लगता है जब मन अनकही बातों से भरा होता है।कैसा विरोधाभास है ...है न...सारे विचार अपनी बाहें पसारे चिंतन के लिए विवश करने लगते हैं।देखा जाये तो यही वह समय होता है जब हम अपने आप से बात कर रहे होते हैं ,अपने सत्य को पहचान रहे होते हैं।संसार की क्षणभंगुरता का ज्ञान भी इतनी तत्परता के साथ होता है कि मन का विचलन बढ़ने लगता है ,सम्भवतः यही विचलन रहा होगा जिसने सामान्य पुरुषों को सत्य का बोध कराकर महापुरुष बनाया होगा। यह सत्य,जिसे संसार जानता है पहचानता है पर उसे स्वीकार करने से डरता है।जीवन का परम सत्य मृत्यु जिससे जीवन भागता है।जीवन का सारा दर्शन रात के अंतिम प्रहर तक सोने नही देता है।सबसे बड़ी विचित्रता तब दिखती है,जब सूरज की पहली किरण अलसाई सी रात को सुबह में बदल देती है।मानव का मन भी वही,तन भी वही,सत्य भी वही जीवन और मृत्य भी वही पर,चिन्तन अपनी राह पर रुक जाता है ,और एक नया दिन नई ऊर्जा,और नए जीवन अनुभवों के लिए बाहें पसारे स्वागत करने लगता है।आस-पास का वातावरण, जीवनचर्या आदि हमें अपनी क्षणभंगुरता का बोध नही कराते बल्कि एक नवीन संकेत उस सत्य की ओर करते हैं जिसे हम समझना नही चाहते...यही न समझना मोह और समझ जाना मोक्ष के समीप लाता है। - मेरी ही कलम से

Thursday, 17 June 2021

कुछ बातें..7

गलियों की चहलकदमी और रौनक के बीच झील सी आँखों में जैसे बाढ़ सी आ जाती है।अपने ग्राहकों को रिझाने की हर कला में माहिर उस औरत के होठों को स्टेपलर जैसे अचानक से स्टेपल कर देता है कि जैसे फिर कभी खुलेंगे ही नही।पर,उस गली से उसके मनोहर के मुड़ते ही उस औरत के होंठ अपने आप खुल जाते हैं, और वो बिकने के लिए फिर अपने कौशल का प्रदर्शन करने लगती है।यही हर रोज होता,क्या उसे नही पता कि इस गली की कौन सी औरत जात अपने जिस्म को छुपा पाई है, उन एक्सरे जैसी आँखों से।यहाँ तो कोई मापनी भी नही ,फिर भी माप लेते हैं,जैसे दर्जी रफू वाली चीज में कितना धागा भरना है जाने कैसे जान लेता है।ये भी तो उसी हिसाब से देते हैं.....रुपये उस समय आत्मा से बड़े नजर आते हैं।आत्मा का क्या है ,वह तो बस शरीर में छटपटाती रहती है, कचोटती है, त्राहि-त्राहि करती है।पर,गूँगी जो है उसकी आवाज किसी के कान तक जाती है। आज दो दिन से वो इस गली से नही गुजरता,कहीं उसने गली तो नही बदल ली।नही नही ..हो सकता है ,उसका कोई काम इधर न हो।हाँ... यही हो सकता है।उसकी आँखों ने तो मेरी एक झलक भी नही देखी फिर भी ऐसा लगता है कि वो मुझे ही देख रहा है, मैं ओट तो ले लेती हूँ ,कि वो मुझे देख न ले उसको देखते हुए...पर...सच तो यह है कि उस समय दिल यही चाहता है कि वो एक नजर मुझे देख ले ।उसकी बाइक की आवाज ही अलग सी लगती है, इस गली में घुसने से पहले ही उसकी गाड़ी की आवाज मेरे कानों तक आ जाती है।तभी तो उस समय से पहले ही मैं यहाँ आ जाती हूँ ,यहाँ से गली की मोड़ जो दिखती है।काश मेरी आँखें उसे हरपल देखती रहती।मुझे न जाने कितनों ने अपना खिलौना बनाया एक ऐसा खिलौना जो दूसरों की मर्जी से चलता है।मेरे अंगों की खूबसूरती को मैंने इससे पहले नही देखा था हर एक अंग में थिरकन सी दौड़ जाती है उसके याद करते ही।उसे तो मैं हर एक साँस की तरह लेती हूँ, छोड़ती हूँ ,फिर लेती हूँ।न जाने क्यों चाहती हूँ वो मुझे देखे मुझे महसूस करे..पर वो नही आता। कितने दिनों से उसे देखना चाहती हूँ, पर देख नही पाती।प्रेम शहद सा मेरे भीतर इतना भर गया है, कि अब डरती हूँ ,कहीं बीमार न हो जाऊं....काश उससे यह कह पाती की तुमसे कितना प्यार करती हूं ,चाहती हूँ कि तुम मुझे मिलो ....तुम मिलो न मिलो पर मैं तुम्हें कभी इस दहलीज़ के भीतर नही देखना चाहती ,तुम कभी भी यहाँ न आना... तुम्हें बिना देखे जी लूँगी पर यहाँ जो देखा तो जी न सकूँगी... अपनी ही कलम से

Sunday, 13 June 2021

कुछ बातें...6

बारिशें ......कितना सुकून देती हैं न,प्रेमी के पहलू में बैठकर बिन पंख उड़ते जाना क्या होता है, वो एक प्रेमी मन ही समझ सकता है।खिड़कियों को भिगोती ये बूंदे जो रह-रहकर छू जाती हैं, और तन-मन को नए रोमांच से भर देती हैं।हर तरफ बारिशें ही बारिशें दिन-रात।ऐसे में दिल यही चाहता है ये बारिशें दिलों में यूँ ठहर जाएँ कि ,कभी.. कहीं न जाएँ। दूसरा पहलू एक गरीब माँ की भीगी गोद मे ,खाने की जिद करता बच्चा जो बारिश को नही जानता पर ,भीगता है अपनी माँ के आँचल में ,उसके लिए बारिशें भूखा सोने के लिए विवश करती हैं, वो चाहता है बारिश कभी न हो।उसे बारिशें बिल्कुल अच्छी नही लगती।भूखे सोना क्या होता है वो चाय और पकौड़े के मजे लेने वाला क्या समझे..

Saturday, 5 June 2021

कुछ बातें ....5

सूनी सड़क पर जहाँ तक नजर जाती है, वहाँ तक तुम्हें मुझसे दूर जाते हुए देखता हूँ... बस तुमसे एक ही चाहत ...तुम मुड़ -मुड़ कर मुझे एक नजर देख लो।तुम्हारा देखना ..बस देखना ही नहीं मुझमें उतरना भी है, जिसे तुम समझ नही सकती.…मैं... न जाने क्यों तुम्हें फिर भी समझाना चाहता हूं,तुम शायद ही कभी यह जान पाओगी कि तुम्हारी किताब में 'आई लव यू' मैंने ही लिखा था ...तुमने कभी पूछा ही नही ,जबकि तुम्हारी किताबें मैं ही तो लेता था पढ़ने के लिए ,पर ...कभी पढ़ नहीं पाता था ...बस...किताब के हर पन्ने पर तुम्हारी उंगलियों को महसूस करता रहता था।तुमने उन पन्नों को कभी तो पलटा होगा।कभी -कभी लगता है कि तुमने मेरा लिखा देखा ही नही था ,कि तुम कुछ पूछती...दिल करता है, फिर तुमसे कह दूँ कि 'मैं तुम्हें बेहद चाहता हूँ, इतना चाहता हूँ ,कि......बस...तुम्हारी खुशी मेरे साथ होने में नही है, यह जानते हुए भी..... तुम्हें प्यार करता हूँ ...बस ...तुम्हारे लिए जी सकता हूँ,तुम्हारे लिए...। आज अपने जीवन के उस मोड़ पर मैं खड़ा हूँ,जहाँ से दो रास्ते हैं एक तुम्हारी ओर.. और दूसरे पर चलकर मैं खुद से मिलूँगा, जो इस जीवन की सच्चाई है।वह सच्चाई जिसमें तुम नहीं होकर भी हो,कहीं न कहीं ...जानता हूँ ,दूसरी राह ही दिल चुनेगा... -मेरी ही कलम से

Tuesday, 1 June 2021

कुछ बातें... 4

प्रेमिका की याद... आज कितने सालों बाद तुम ठीक मेरे सामने थी, तुम्हारे होठ खिल-- खिलकर मुझसे छुपना चाहते थे।हम दोनों की आँखों में खुशी के आँसू एक साथ तैरने लगे ,तुम तो उन्हें आँखों में संभाल भी नही सकी।आँसुओं ने तुम्हारे गाल गीले कर दिए।स्वर तन्त्रियाँ जैसे स्थिर हो गई हो, हम दोनों ही कुछ बोल न सके ,कुछ कह न सके....बहुत कुछ कहना चाहता था मैं ...और शायद तुम भी ....पर बिन कहे हम दोनों ही फिर दूर होने लगे पिछली बार की तरह। यादें भी न जाने क्यों गले पड़ जाती हैं, जैसे यादें नहीं तुम ही हो।जब भी तुम्हें याद करता हूँ ,तुम्हारी गली के हजारों गुलाब मुस्कुराने लगते हैं ,और अपनी खुशबुएँ जैसे तुमपर लुटा रहे हो।उसी गली से गुजरते हुए जब तुम्हारी उंगलियों ने मेरी उंगलियों को छू लिया था,मैं तुम्हें बता नही सकता कि कितनी तरंगे मुझे अपने साथ बहा ले जाना चाहती थीं....कामनाएं क्या होती हैं... शायद उस दिन मैंने जाना था,झूठ नही कहूँगा उस दिन मैं तुम्हें दुबारा छूना चाह रहा था .....तुम्हारे हाथों को सहलाना चाह रहा था।आज फिर जब तुम मुझे अपने आस-पास महसूस हो रही हो ...वो तरंगे मुझे फिर जैसे बहा ले जाना चाहती हों....शायद तुम्हें भी ऐसा लगा हो .....शायद।न जाने कितनी बार तुम्हें एक बार और देखने की चाहत होती रहती थी ।तुम्हारी गली में मुड़ते ही मुझे ऐसा लगता था कि ये पूरी गली तुम्हारी ही है इस गली का कण-कण तुमने छुआ होगा ।न जाने प्रेम का ये एहसास क्या है कि मुझे कोई बात बुरी नही लगती थी ,लगता था कि इस दुनिया में दुःख नही बस प्रेम ही प्रेम है।तुम्हारे नाम मे जैसे मुस्कान घुली हो जो हर पल मेरे होठों पर टहलती रहती थी। पता है मुझे तुमने भी मुझे भुलाया नही है।तुम मुझे खुश देखना चाहती थी,तुम्हें लगता था कि शायद तुम्हारे जाने के बाद मैं खुद को हार जाऊँगा।तुम गलत नहीं थी,हार तो मैं जाता ही गर मुझे तुम्हारी खुशी का ख्याल न आता ...तुम जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर दिखते रहना.. - मेरी ही कलम से

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...