Thursday, 24 October 2019

हाँ ...तुम

नवनीत सी पथ मैं 
और गतिअवरोधक से तुम 
तकलीफों की इस राह से 
गुजरता हर लम्हा 
सख्त करता है मुझे 
और सिमटते हो तुम ...
हाँ ...तुम
         -डॉ०संगीता

Wednesday, 23 October 2019

दुनिया कहती है

अवसादों की बनती चट्टानें,
कभी तोड़ी न जा सकेंगी
ऐसा लगता है,
जो खाई बन रही है
खुद के ही भीतर ,
वो खाई ही रहेगी ,
ऐसा लगता है
मुस्कुराहटें बिखेरती 
 होठों का खिलना 
हर बात छुपा जाता चेहरा
जो दुनिया से परे 
अपनी दुनिया में जीता है
यूँ ही नही,
दुनिया कहती है-
खुशनसीबी कदम चूमती है...
                     डॉ० संगीता

 

Tuesday, 22 October 2019

देखा है क्या...

जिनके तन पर
चंद कपड़ो की कतरने झूलती हैं,
नन्हे-नन्हे उँगलियों की
ढीली पड़ती पकड़ ...
सांसो को  ,हवा यूँ उड़ाना चाहती है,
विवशता के शिखर  चढ़ती वो 'माँ'
अपने लाडले का यूँ
मुख चूमती है,
रह-रहकर वो
माथे की शिकन
हथेलियों में देखती है...
देखा है क्या...?
       -डॉ० संगीता




अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...