Wednesday, 28 February 2018

वो....

हाथ थमा  कर  मुझे
वो घूम आया जग सारा,
मैं  बैठी ही रही राहों में
मन तो उसके साथ ही गया था
पर,
उसके  आने पर भी
मेरा मन  नही आया,
उसकी खूबसूरत  सी तस्वीर पर
ठहरी मेरी नजर.....
जीवन्तता  चाहती है,
कैद मुस्कान  को खुद पर
बिखरते देखना चाहती है....

                           -संगीता

Sunday, 25 February 2018

वो रोके न रुका....

दसों द्वार पर
पहरा लगा बैठी थी, 
वह छूकर गुजर गया
जैसे वो हवा हो, 
उसके  होने में न होना
विराग  जगाता है,
                    -संगीता  

Saturday, 24 February 2018

जो लिखा था ....

उतर आया पन्नों पर
जो तैरता था आँखों में,
किसी बंद  लिफाफे सा
खुल  गया था वो,
कोरे  कागज  पर
पानी की लिखावट को
पढ़ लिया था उसने,
किस्मत  की
 एक दूसरे को काटती रेखाँए
अबूझ भाषा सी ये लकीरें
पढ़ी नही जाती उससे भी....
                                   -संगीता


Tuesday, 13 February 2018

सृजन के हर बीज में

सृष्टि के कण -कण में
परम् शक्ति का मिश्रण,
हर परिवर्तन में हस्तक्षेप
नियति का,
शिव मंगलकारी
प्रेम सूचक प्रिय के
दास परिवर्तन के दास बन गए
सती को पुनः जीवित न कर सके,
हलाहल भी जिस कण्ठ को मृत कर न  सका
तिरस्कार का घूंट भारी पड़ गया
समाज के बने -बनाए नियम में
वो क्यों बंध गए ,
बिकराल रूप
फुँफकार मारते सर्प
रौद्र रस का सृष्टि में संचार
बिकल हृदय के रुदन का
 उत्तर न मिला
पर,विकल्प मिला...
                         - संगीता
         


Sunday, 11 February 2018

ऐसा है वो

तुम्हारे सवालों में
जबाब बनकर
बहते सैलाब में लोहे सा पिघलकर,
जीत लेता है वो
समर सारे
पर, हार जाता है
तुम्हारे नेत्रबाण से
ओस के बूँद सा
 बिखरता है गीले बालों में ,
सुख- दुःख की हर घड़ी में
आता है नजर वो
आँखों के कोने में ,
प्रेम की पराकाष्ठा पर
जा पहुँचा है वो
अगम-अगोचर सा
रहता है मन से परे
पर सुन सकता है वो
हृदय का हर स्पंदन
तुम्हारे लिए ईश का
दूसरा नाम है वो ....
तुम्हारे लिए सुबह भी
शाम भी वो
              - संगीता

Saturday, 10 February 2018

कितनी खाली सी हो

मैं दूर का प्रेमी हूँ
तुम्हारे पास रहता हूँ
उपहार देता हूँ तुम्हें 
पर,जानता नही उपहार को 
नन्हें-नन्हें, रंग-बिरँगे
भालुओं के भोलेपन में
जब तुम खो जाती हो 
जब तुम्हारा रोम-रोम
खिल कर कुछ कहता है,
उछलकर,
'थैंक्यू 'में गोल होते तुम्हारे होंठ,
साथ में एक शरारती सी मुस्कान
जब छू लेती है 
मेरे गालों को 
सितारे सी चमकती आँखों को 
जो मिलता है
उसे मैं अपना उपहार समझता हूँ
दिल करता है 
काश ..मैं होता 
मखमली निष्प्राण
 रंगीन छोटे भालू सा 
या ...होता मुलायम खरगोश सा...
तुम मझे पाकर
झूम जाती 
बार -बार चूमती मुझे 
मुझे सीने से लगाकर सोती 
दिन- रात मुझसे बातें करती
भले रूठ जाती दुनिया से 
पर, मुझपर प्यार लुटाती 
मेरी समझ से परे तुम 
खुद ही बता दो 
क्या ....चलते -फिरते काले भालू से
इतना ही प्रेम जताती....?
अब भी यही सोचता हूँ 
काश....मैं....
                    संगीता

Saturday, 3 February 2018

तुम हो

सावन तुम
बरसात भी तुम हो
गीले जज्बात ओढ़े
दिन -रात भी तुम हो
इंतजार में जिसकी
दिन दूनी
रात चौगनी
मिले भी तो,
कोरा एहसास भी तुम हो 
अटखेलियाँ करती हैं
मन की तरंगें जब ....
तब ,जो छा जाता है, तन -मन पर
अनमोल वह भाव भी तुम हो ।
                                     -संगीता


मुस्कान तुम्हारी ...

तुम्हारी खिलखिलाती
आँखों  के साथ
 चुलबुली मुस्कान
बहुत मेल खाती है
तुम जानते ही नही
वो मुझे जीना सिखाती है,
तुम्हें ,पता तो है...!
वही ,मुझे हरदम गुदगुदाती है
तोड़ देती हूँ सारे बन्धन
उसी के लिए
जो मुझे नींद में भी
सोने नही देती थी ,
अब ,वही ......
काटने को दौड़ती है
तुम्हारी कुटिलता से
मेरी होठों की मुस्कान
छू ...हो जाती है,
और,
कुछ देर होंठो पर
हल्का सा  कुछ
ठहर जाता है ।
                      -संगीता






गहनतम हो ...

घिरती अंधियारी सी
काले बादलों का शोर
कड़कती तेज ध्वनि के बीच
कुछ प्रकाशमय सा
ढूंढ लेता है  मुझको
और ,बता देता है
कालिमा में छिपे
उजाले का रहस्य
जहाँ,
अगोचर सी दीप्ति की
निरन्तरता
ओढ़ लेती है
गुरु- गहन-गम्भीरतम
आपात के क्षण को
                        -संगीता


Friday, 2 February 2018

हाँ

अनुपम हो तुम
श्रृंगार ,
हर्ष-विषाद 
भक्ति -वात्सल्य
अनुराग -विराग 
काम -मोक्ष 
रसयुक्त -रसहीन
मूल्यों का संचालन तुमसे
जीव ...निर्जीव ..तुम बिन
तुम्हारा साम्राज्य
तुम्हारी अलौकिक क्षमता 
जगत से परे 
असीमित विस्तार  मनों पर 
तुम्हारे दोनों पहलू 
प्रतीक्षा-परिणति
क्षणिक सुखदायी 
दीर्घ दुखदायी
फिर भी ,
तुमसे आबद्ध हैं हम।
                              -संगीता 
                           

कैसा लगता है...

सौंदर्य सुषमा से सम्पन्न
गोलाकार धरा की
अनगिनत  आँखें
तुम्हें निहारती है...
अनुरागी चित्त की
अतुलित कल्पनाएँ
तुममें साकार होती हैं।
तुम्हारा उभरता बिम्ब
टूटती वर्जनाएं
एकसाथ
तुम ,इस पार भी
उस पार भी
पूरी दुनिया का
अधूरा अस्तित्व
सोलहों कलाओं की
 एक साथ  अनुपस्थिति
कहीं तुम ही तुम हो
कहीं हो ही नही
ग्रहण की कालिमा में
उजला, मुक्त होता
निर्जीव तन
अनुपम ..तुम्हारा रूप
सूर्य की शीतलता के राग तुम
उसी की दाहकता में
दमकता तुम्हारा
चाँदी सा वदन
देखकर
तुम्हें ,अनन्त स्पर्श करता है
अमृतकलश वाहक
ज्योति का स्पंदन
भावनाओं का तन्तु
जुड़ा है तुमसे
तुम्हें कैसा लगता है ...?
                              -संगीता

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...