Thursday, 30 November 2017

मधुर अनुभूतियाँ...

श्रृंगार हो बसन्त का
जब तुम मुस्कुरा दो ।
अपने प्रेम की शीतल चाँदनी,
कपूर सी उजली रात में,
रेशम सी चिकनी अनुभूतियों से
हृदय की गहनतम गुफाओं में
प्रेमरङ्ग में सराबोर....
अनुराग तुम्हारा चातक सा
मेरे लिए तुम्हारा प्रेम अर्पण...
जिससे मन मोहित हो गया।
तुम्हारे असीम प्रेम की अतल गहराइयों में,
उतरने को आतुर मेरा हृदय...
तुम्हारे प्रेमरस से अभिभूत हो गया।
उस बीच तुम्हारी ..स्निग्ध मधुसिंचित वाणी ने
खींच सा लिया.. अपनी ओर
तुमने मेरा जीवन ....
मेरा मन उपवन....
मेरे हृदय के हर स्पंदन में
प्रेम ही प्रेम भर दिया.....
                                   -संगीता

Tuesday, 28 November 2017

शेष....

उस ...माँ के पास मैं गई उनके बेटों को बेरुखी भरी नजरों से देखा और कहा-जिस माँ ने जन्म दिया वो आज तुमलोगों पर इतनी बोझ कैसे बन गई?इतना सुनते ही वो भड़क गए और बोले, मैडम आपको क्या पता जिस पर पड़ती  वही जनता है'उपदेश देने तो सभी आ जाते हैं' इतना सुनकर मैं थोड़ी ठिठकी और शांत हो गई मैं तो शांत हो गई पर उनके भीतर के ज्वालामुखी के छिद्र जैसे अचानक से खुल गए हों ।लावे की तरह उनका आक्रोश फूट पड़ा।मेरे बिना पूछे ही वो बड़बड़ाने लगे-'बाप मर गवा हमरा ,ईई   हमन क जिनगी खराब कर दिहिस.... हमरे बड़के चाचा कहत रहि गएन ई उनसे बियाह नई किहिस उनके एतना धन धरम रहा ....आज हमन क जिनगी बनि गवा होतीं...हमन के हमेशा दुई दुई पिसा खातिर तरसलिं..... ई कहिस हम कौनो के आगे झुकब न .....एकरा शान में हमन क जिनगी जहन्नुम बनी गवा' इतना सुनने के बाद मेरे कदम न आगे बढ़े न पीछे हों समझ में नही आ रहा था की उस माँ की क्या मजबूरी रही होगी?यदि किसी का पति असमय गुजर जाए तो उसे किसी पैसे वाले से विवाह कर लेना चाहिए या अपने बच्चों की परवरिश अपने बूते पर करनी चाहिए.... क्या उस माँ की कोई कामना शेष न रही होगी.... क्या उसे हर प्रकार के सुख की आवश्यकता नही रही होगी..... उसके संघर्षों का कोई महत्व नही ,उसके त्याग का कोई औचित्य नही ......उसकी ममता के तन्तु  में वो बल नहीं जो अपने बेटों को बांध सके..... उसके बेटों की मनः स्थिति  ऐसी क्यों बनी?ऐसे न जाने कितने क्यों ? मेरे मन में उथल -पुथल करने लगे जिसका उत्तर तलाशने में मुझे न जाने कितना समय लग जाए इसका अंदाजा मुझे नही।ऐसी भावना सिर्फ उनकी नही है ऐसे न जाने कितने होंगे... क्या आने वाली पीढियां वय वृद्धों के आशीष तले नही रहना चाहती?क्या हम अपने बच्चों से भी यही उम्मीद करेंगे की वो हमारे बारे में ऐसी ही सोच रखें?
                                                                                                            -संगीता

Saturday, 18 November 2017

अकस्मात् जो घटना हुई..

आज ट्रैफिक के बीच कुछ ऐसा देखा मैंने की जुबाँ को जैस पक्षाघात सा हो गया हो ...एक माँ के दो बेटे  जिनके कन्धे को अपना सहारा बनाने के लिए माँ  ने कदम बढ़ाये पर वो गिर पड़ी ।उसके कण्ठ  ने जैसे स्वरों का मार्ग अवरुद्ध कर दिया हो ..उसकी आँखें क्षण भर के लिए जैसे अपने बेटों से उत्तर पाने के लिए  उत्सुक हुई हों... पर निराशा से नत आँखों में उत्तर साफ दिखने लगा ,कि बेटों ने माँ को सहारा क्यों नही दिया.....तबतक एक बेटे ने माँ को झटके से उठाया मुझे क्षण भर में ही स्वयं के अनुमान पर आशंका हुई ,इसी क्षण भर में ही उस बेटे ने अपनी माँ को दस गुना वेग से जमीन पर पटका ।मैं स्तब्ध ... ये क्या हुआ ? वहीं दूसरे बेटे ने उसी दस गुने वेग से माँ पर गालियों की बौछार की 'ई!!!साली अइसे  ना मरी..... अरे...ई ..साली सब खाइ के मरी'  इतने अपशब्द..... मैंन किसी  को न कहते देखा है ..न सुना है।मुझसे न जाने क्यों  बस मे बैठा नही गया जैसे ही बस आगे बढ़ी मेरे कदम  भी आगे बढ़े और मैं नीचे उतर आइ उन बेटों का पशुवत् व्यवहार का कारण जानने के लिए... मुझे जो उत्तर मिला वह.....

Wednesday, 15 November 2017

अन्तर्मन का दीप

अन्तर्मन का दीप...जलता है तुमसे
तुम सृष्टि का कण कण आलोकित करते हो,
भावनाओं के पार तुम्हारा तेज
करते हो सब सूक्ष्मतम संचालित...
फिर क्यों नियति सब कुछ अलग करती है,
तुम्हें पाने में लगेंगे कितने जन्म
कुछ तो बता दो....
ऋषि मुनियों सा तेज नही है मुझमे,
फिर भी अभिलाषा है प्रबलतम तुम्हारे लिए....

जब कोई रिश्ता पेंडुलम जैसा हो जाता है.............

जब कोई रिश्ता पेंडुलम जैसा हो जाता है, तो वो किसी को सुख नही पहुचाता। वह सम्बन्ध मात्र कालक्रम का द्योतक बना रहता है, कि सम्बन्धित व्यक्ति कितने समय तक अनचाहे रूप से जुड़ा रहा। मन तो घड़ी की सुईयों के साथ पीछे ही छूट जाता है। समाज में विशेषतः पति- पत्नी का सम्बन्ध कुछ समय बाद ऐसा ही हो जाता है, पर उस सम्बन्ध में बंधे रहने का सबसे बड़ा कारण अपनी सन्तान होती है, जिसे न माँ छोड़ना चाहती और न पिता के लिए यह सरल होता है। दोनों चाहे न चाहें फिर भी उन्हें साथ रहना होता है। सम्बन्धों की इस विवशता के लिए मध्यम मार्ग पति- पत्नी के आपसी सामन्जस्य में होता है...पर अविश्वास और असहयोग का अपारदर्शी तत्व बीच में आता है।

माँ...

माँ!  तुम मेरी पालनहार ,
मेरे जीवन का आधार हो।

Friday, 3 November 2017

मानवता की परिभाषा दे......

हम भीगे जग भीग गया
हम जो सिहरे जग सिहर गया
ये रीत है कैसी दुनिया की
खुद का दुःख जग का दुःख लगता,
खुद का सुख सबका सुख लगता,
 भीगती फसलों को निहार कर
उसको लगता वसुधा तरल हुई
वह भूल गया सब लोभ मोह
खिलती फसलों की हरियाली में
करता विनती वह बार बार
हे प्रभु!ज्यादा न दे तो कम न कर
प्यासी वसुधा की प्यास बुझा
सिहरी वसुधा को तपन दिला
हर कंठ को मिले बहती गंगा
पर नदियों को भी मर्यादा दे,
छप्पर से गिरती जल की लकीरों में,
कष्टो का भी न आभास मिले
भूखे पेट भी कर लें राम भजन
तू जब जब दे जग को दे
पा लूंगा मैं भी अपने हिस्से का
तू दानी है अब देर न कर
जग को जब तब सद्बुद्धि दे,
हे प्रभु! जब दे तब सबको दे
 मानवता की परिभाषा दे......
                              ---संगीता---

Wednesday, 1 November 2017

मुझे लगता है.....

भावनाओं के उमड़ते सागर लेकर,
कुछ सीप कुछ मूंगे मोती लेकर,
तुम्हारी स्मित मुस्कान को देखकर,
तुम्हारे आँखों के नमकीन कणों को देखकर,
बार-बार तुम्हारी छवि मेरे आँखों के सामने आती है,
जैसे तुम मुझसे कुछ कहना चाहते हो...........
                              ---संगीता---

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...