इंसान एक बार मुस्कुराना भूल जाए तो उसे अपना मुस्कराता चेहरा भी भूलने लगता है.....इसे उस तरीके का भूलना कह सकते हैं, कि जो खुद के ही भीतर छुप जाती है। जिसे हम ढूँढ नहीं पाते। अब मुझे यह सच मे महसूस होता है कि हर रुलाने वाले की आंखें उसी दर्द में रोती हैं...जो दर्द उसने दूसरों को दिए होते हैं....बारी- बारी से रोना रुलाना चलता रहता है...पर खुशी के समय या किसी के प्यार में पड़ जाने पर य़ह महसूस नहीं होता...क्योंकि उस समय तो दिल उड़ रहा होता है, किसी की बाँह थामे...
मेरी ही कलम से...