Friday, 29 December 2017

वो...दिखता नही

गले में कुछ -
फँसा हुआ सा
नसों  में कुछ -
सूखता हुआ सा
रगों में कुछ  -
रुक हुआ सा
साँसों में कुछ -
थमा हुआ सा
वो जबसे है ..
कुछ न कुछ करवाता ही है
 अपने इशारे पर ,
नचाने की ताकत रखता है वो,
सूखती अंतड़ियों की अकुलाहट
और ,
दिन में तारे दिखाता
जमीन पर गिरा देने की ताकत ,
उसमें है।
उसकी मार खाकर ,
निडर हुआ हर एक जीव
कृत्य -कुकृत्य सब भुलाकर
या मरता है ,
या ...मारने को विवश...भी होता है,
तर्क- वितर्क
सत्य-असत्य,
सबसे परे वह ,
जीव के जीवन भर
क्षुधा भरने पर ,
मन भरने पर ,
वो ,जो ...दिखता नही
चेतना को चैतन्य कर,
रग -रग में प्राण का संचार कर
स्वतः ही मर जाता है।
                              -संगीता


Saturday, 16 December 2017

वो जो है....

आज क्यों हवाओं में कोई घुला सा लगता है
जैसे वो यहीं कहीं बिखरा हुआ है
वो तो यूँ ही ....यहाँ वहाँ फिरता रहता है
जैसे.... उसे उड़ना ही लुभाता है
उसकी हर एक उल जलूल बातें भी  हसाती ही हैं
जैसे हसाते ही रहने की फितरत है उसकी
वो जो है .....
दिखता ही नही ....
रहता है हर कहीं....
पर ...
मुझसे ही मिलता नही....
कैसे कहूँ की ....
वो मेरा ही मन है
मुझमें ही रह कर मेरे साथ चलता नही...
जरा सी बात भी जिसे छू जाती है
वो जो है...
बस वही है...
जो खुद की ही करता है....
                               -संगीता

Saturday, 9 December 2017

आओ तो सही

अकुलाते मन की पीड़ा को 
तुम समझो तो सही 
ऊँचे भवन ...अनुकूलित गृह से 
एक बार निकलो तो सही
जीकर देखो उनका जीवन 
जिनको जीते देखा ही नही,
आशाओं की दमघोट गलियों से
एकबार गुजरो तो सही ,
तुम्हारे नीति नियम सब कुछ को
एकबार भोगो तो सही ,
सत्ताधारी चोले की गर्मी से निकल
हम जैसा बनकर देखो तो सही,
सह पाओगे क्षण भर भी नही 
अपने ही थोपे भार सभी 
हम जनता हैं 
हम हैं तो तुम हो 
तुमसे हम ....कभी भी नही 
अपने हाथों की शक्ति को 
कभी तो ,
महसूस करने दो ...
हम भी जान सकें 
हम जीते हैं 
सबसे बड़े संविधान तले 
जहाँ जनता के बनाए जनप्रतिनिधि
जनता के ही रक्त के प्यासे बन बैठे 
इन्हें... जोंक ...दीमक
कुछ भी कह लो 
ये इन सबसे भी ऊपर हैं 
कुछ लोग जो हैं भलेमानुस
वो शासन  की कठपुतली हैं
आटे में  नमक जैसे ये हैं 
अनाचार की गोल कड़ी में 
दोष  कहूँ मैं ...किसका है..
अपने अधिकारों को पाने की चाह में 
कुछ प्रयास करो तो सही ..
                                     -संगीता


 

 

दुखती रग ....

तुमने हमको  बहुत सताया
अब हम तुम्हें सताएंगे
जैसे गिरते थे अपने आँसू
वैसे तुम्हें रुलाएंगे
तुम जीत के देखो हृदयसाम्राज्य  जगत का 
हम तुमसे हार जाएंगे,
हमारा हाल... बेहाल तुम्हीं से है
तुम्हारा अंत  है ...दुःख का अंत
तुमने काया पर जख्म दिए
और ,बार -बार कुरेदा भी
अधिकारों का करते भ्रमलेपन
देते हो झूठे दिलासे भी ,
हमारी अपनी दुखती रग
छिपा न सके तुमसे कभी
और... बार -बार करते प्रहार
अदृश्य चेतना द्वारों पर
स्पंदनरहित हुई धड़कन
अब दुखती नही दुखती रग भी ...

Wednesday, 6 December 2017

विचार ....

अपने जीवन का एक ध्येय मोक्ष को मानकर चलना और जीवन के मार्ग में आने वाली विपत्तियों के सामने घुटने टेक देना ,हार मान  लेना और अपने अधिकारों का हनन होने देना ,अहिंसावादी होकर खुद पर अत्याचार होने देना क्या कायरता न होगी ,बजाय इसके की हम अपने अधिकारों के प्रति सचेत हों, अपने या किसी अन्य पर हो रहे अत्याचारों का विरोध कर सकें।मार्ग या माध्यम में अहिंसा की अधिकता हो ,यह ध्यान रखकर यदि मोक्ष की और आगे बढ़ें तो मोक्ष का मार्ग सम्भवतः सरल हो सकता है।
                                       -संगीता

Sunday, 3 December 2017

कहानी - 'मेरे लिए तुम'

सीढ़ियों से उतरते हुए आभा ने अपने बारे में जो सुना वो सुनकर उसके होठों  पर तैरती मुस्कान किनारा नही पा रही थी।उसने तो सोचा भी न था  उसकी शादी की बात घर वाले करना चाह रहे हैं।मन ही मन हो  रहे प्रिय से सम्भावित संवादों में खोई उसे पता ही न चला कि  कबसे माँ आवाज़ लगा रही है,जैसे बेमौसम बारिश में छत पर सूखते कपड़े उठाने के लिए वो दौड़ी हो ऐसी दौड़  देखकर भाभी बिना व्यंग्यवर्षा के न रह सकीं ,'अरे! नन्द रानी के पैरों में पंख लग गया है, जो उड़े जा रही हैं' आभा के चेहरे की आभा जैसे अकस्मात् बुझ गई हो ,उसके चेहरे की छिपी झुर्रियाँ जैसे अचानक से उभर आई हों, माथे की अनगिनत लकीरों में उसकी छिपी किस्मत वाली लकीर गुम हो गई हो ,उसकी पलकें  गीली हो गईं ,आँखों के सामने पलभर में रोज की दिनचर्या के दृश्य  उभर आए, अपने सामने से  दृश्य को पर्दे सा हटाते हुए आभा ने माँ से  इतना ही कहा-माँ! आज घर का कोई जरूरी सामान तो नही लाना है?आज....महीने का आखिरी दिन है ..तो.....।भाभी का मुँह खुला ही था की माँ बोल पड़ी, 'अपने लिए भी कुछ सोच लिया कर ....घर में कुछ न कुछ तो घटा ही रहता है, तूँ जा ।
            आभा के कदम आगे बढ़ रहे थे और मन पीछे भाग रहा था ,उसका मन उसके कदमों से मेल नही बिठा पा रहा था ।आज फिर प्रदीप का चेहरा बार- बार आँखों से चिपक जा रहा था जाले के जैसा , यादों की मकड़ियों ने इतने जाले पलभर में कैसे बुन डाले ?अपनी यादों से अफनाकर जैसे वो झटके से दूर खड़ी  हुई थी पर मन पर सवार मधुर-तिक्त अनुभूतियाँ आपस में उलझ रही थी।बस एक ही वाक्य आभा के कंठ से बाहर आना चाह रहा था, ' मुझे कमजोर नही होना है।' आभा खुद से लड़ने लगी,हर क्यों का मैं ही जबाब हूँ ...क्या हुआ इस बार भी  भाई यही कहेगा 'लड़के वाले तेरे गुन जान गए होंगे..... तभी तो....।माँ ...अपनी बक्से से वो ....चूनर निकालकर फिर रख देगी  ....।भाभी अपनी कुटिल मुस्कान से .....(जैसे कोई शब्द  न सूझ रहा हो  उनके व्यंगबाणो के लिए )...ह्म्म्म्मह.....और ,पापा की कन्धों में इतना बल ही कहाँ... छोटी बहन ........मेरे बाद शायद .....वो भी  .....(गर्म सासों को जैसे एकसाथ झटके से मुक्त कर दिया हो)....(फिर यादों में घिरते हुए)....प्रदीप !तुम्हें पता है, तुमसे मैं इतनी नफरत करना चाहती हूँ की तुम मुझसे दूर हो जाओ... पर तुम मुझे और भी जकड़ लेते हो अपनी यादों में ....काश तुम्हारे साथ स्वर्गमयी सपनों के साथ उस रात ....न निकली होती ...न तुम मुझे अपनी वासना का ग्रास बनाते..... न मैं अपने प्रेम का खण्डित रूप देखती ..।मेरी आत्मा का रुदन गर तुम सुन पाते तो ..आज तुम्हें....(सासों का गुबार फिर झटके से बाहर आया ,खुद को समझाते हुए)....खैर...शायद मेरी किस्मत में तुम्हारे बाद कोई और .....मैंने सोचा न था।आज घर पर अपनी  शादी की बात सुनकर मैं बहुत खुश हुई थी। शायद 45 साल की अर्धविवाहिता   को उसका प्रिय मिल जाए .....पर एक बात सच कहूँ.... जब भी मेरी शादी की बात किसी से होती है तो मुझे उसमें तुम्हारी शक्ल दिखाई देती है।...उफ्फ!!!..रोज ही मुझे इस तार में उलझ जाना पड़ता है.... खेलावन भैया! आपसे कितना कहा है ,इसे बांध दीजिए पर ....(अपने ऑफिस के काम में लगते हुए)....आज फिर घर से पचास किलोमीटर का समय जैसे मिनटों में तय कर लिया ..पता ही न चला।
                                                                                                                                       -संगीता

Friday, 1 December 2017

विहान....

नव युग की नवसिंचित बेलें फैल रही हैं जल थल में
तुमने नया राग है छेड़ा ...
भारत के पावन कर्ण -कर्ण में
सुना किसी ने मधुर राग
किसी को भाया सुरा साज
तुम देख रहे हो संजय से
भारत को अति महान बनते
तुम भारत के वंशज हो
अतिभार तुम्हारे स्कन्धों पे
मानवता का पाठ  पढ़ाना पड़ेगा तुमको
इस जग को पग पग में....


तुम हो यहीं कहीं....

तुम्हारे दामन में
तुम्हारे पहलू में बैठा है कोई....
जिस ओर तुम्हारी नजर जाती ही नही
या यूँ कहूँ कि
लौट आती है तुम्हारी नजर मुझसे टकराकर
जैसे मैं कोई सागर की लहर हूँ
जो रोज हर क्षण टकराती रहती है,
सागर किनारे चट्टानों से
तुम्हारे आँखों में उमड़ते वो ....
प्रेम के बादल
जो बरस जाना चाहते थे मुझपर
कोई तो बात थी तुम्हारे चेहरे की कशिश में
या... आँखों की चितवन में
क्यों ....खींचती हैं वो आँखें बार बार
यादों के तलघर में
जो लम्हें गुजार दिए तुम्हारे होने में
तुम्हारी हर एक खिलती मुस्कान से
तुम्हारी हर एक याद से
तुमसे ,
दूरी मेरी ...
फासलों की नही .....बरसों की है
तुम हो गए हो दूर कितने .....
मेरे करीब होने पर भी
आज भी मैं वहीं हूँ..... पर
 कदमों के नीचे की जमीन बदली सी है,
हर एक आहट पर मुड़कर देखना ,
जैसे मेरी आदत सी बन गई है ,
मन कहता हैकी तुम नही हो
पर ...दिल कहता है -
तुम कहीं तो हो .......
                                   -संगीता

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...