Friday, 18 December 2020

माथे की लकीरें

 उसकी हँसी के आगे

वारी थी जिसने दुनिया

थी आज चुप हो बैठी

बातों की जो थी मलिका

खाली हथेलियों  के बीच

कुछ तो भरा था...

भरी झोलियों  में आज

कुछ भी न मिला था।

हाथों की लकीरें 

उसको यूँ ही छूते-छूते

बन ही गई हैं माथे की लकीरें

         डॉ०संगीता



अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...