Monday, 22 June 2020

आज फिर...

नन्ही सी शाख पर आती नही
कोई कोमल सी मुस्कान
फिर कोई गर्म पानी  सा
जड़ों को छू गया....
दर-दर भटका था जो
चंद टुकड़ो के लिए
आज फिर उसी तरह
खुद को खो गया...
काश कुछ निवाले
भूख को मिटा दे
यही सोचकर
 वह,आज फिर सो गया....
                  -संगीता

Saturday, 13 June 2020

रिश्ता...

वह  उसे कहता कुछ न था,
जिससे अलग वह न था,
तंतु से तंतु  उलझा तो था,
पर,गाँठ कहीं पड़ा न था।
तरंगों का आना -जाना था,
पर,दोनों मुँह पर ताला था,
भेद दोनों का खुला-खुला था,
फिर भी,गला रुधा-रुधा था।
जो भी था अनजाना सा था ,
गैरों में भी पहचाना सा था,
लिपटना जिससे न गवारा  था,
फिर भी,आज उसी से हारा था।
                              -डॉ०संगीता


Monday, 8 June 2020

आज फिर...

कबसे बड़ी कोशिश किया जा रहा है,
कि शब्द हैं ,जिनसे न जिया जा रहा है।
खामोशियों की लिपटती परतें तो हैं
पर,शोर क्यों दिल किये जा रहा है।।
चंद शब्दों की आवाजाही भी बंद है,
हाथों में खुली किताब, रोशनी पाबन्द है।
सोचने -समझने की ताकत भी जा रही है,
जो बनी थी जरूरत ,आज वही जरूरतमंद है।
                                        -डॉ०संगीता  

Saturday, 6 June 2020

दर्द पूरा का पूरा...

एक दर्द रहता था
जिस्म के भीतर,जो रह -रह कर
आँखों को नमकीन करता था
एक दर्द उतरता था
पन्नो पर स्याही में घुल कर
जो अपना हाल बयाँ करता था
एक दर्द  ठहरता था
शीतल सी छाँव लेकर
जिसकी लिपि को पढ़ा न गया था....
                               -डॉ०संगीता

मोड़ पर पहुँच कर....

चलते-चलते बड़ी दूर तक चले आए
जाने क्या पाने की चाह,दिल में छुपाए 
सब कुछ पाकर भी ,कुछ पाने की चाह
रुकने न देगा मन को ,कदम चलते रहेंगे राह
 कहीं रुक कर ,देखा पीछे ,किसी मोड़ पर  मुड़कर
क्या -क्या पाया मैंने, क्या चली आई खोकर
अब लौटना न होगा कभी उस गली, उस डगर
बढ़ते कदम, पीछे की राह, रहने नही देते क्षण भर....
                                      डॉ०संगीता
                                         लखनऊ


अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...