Saturday, 31 March 2018

तुम...

जब भी कोई बोझ उठाया न गया
तुम्हारे कन्धे पर डाल दिया
लाचार किसी को जब देखा
तुमने कन्धे का बढ़ा  दिया
झूल जाता है जो कोई
तुम्हें पकड़,
उसके भावों को तुमने सर चढ़ा लिया,
प्रेम के पिंघे मार -मार
हर ओर जो कन्धा झुका दिया ,
दुनिया के गम भी दूर हुए
आँखें भी जीभर रो डाली
तुमने जो,  सर कन्धे से टिका दिया...
जीवन की अंतिम यात्रा में
कन्धे ने  ही है भार सहा….
फिर ढूँढता है तुम्हें कोई ,
तुम्हारे कांधे की विशालता
तुम क्या जानो
मैंने सदा ...
तुमसे बढ़कर माना इसको
जिसने पग -पग पर सबका साथ दिया....
                                                 -संगीता

Wednesday, 28 March 2018

हकीकत कुछ और है......

थक जाती हूँ.....
मुस्कुरा कर हर रोज
सच्ची मुस्कान गुम सी है..
खुद से ही करती हूँ हजार बातें
आवाज कोई मेरी सुनता ही नही....
पढ़ लेती हूँ
मन के कोरे कागज भी
जिन्दगी ने न जाने कब,
पढ़ना सिखा दिया...
खंजर सी चुभती बातें मुझे
तरस गए है कान मिठास के लिए....
                                         -संगीता




Thursday, 22 March 2018

जो देखा वो था नही....

पर्वतों की नीलिमा को ढकती सफेदी के बीच
तंग बर्फीले राहों  से होकर
हैरत भरे स्वप्न की मनोरम छटा
मन को रोक लेना चाहती है
पर, मैं भागती हूँ....
जाने कहाँ पहुँचने की चाह लिए,
गति बढ़ जाती है हृदय की 
 कदम जब ठहरते हैं
कोई नही उस हिमगिरि के शिखरों पर
सिर्फ मैं...
मैं रोती हूँ बेतहाशा
नजर में नही मैं किसी के 
आँसू गिर रहे हैं 
मैं उठ रही हूँ.....?
                   -संगीता





Tuesday, 20 March 2018

बचपन ....उम्र भर नही ...

गुब्बारों से खेलने की उम्र में
वो, गुब्बारे बेंचता है,
गली,चौराहे ही नहीं
हर ओर से गुजरती नजर से
वो, गुज़ारिश करता है,
खरीद ले कोई
दो -चार न सही
एक ही ,
मिल जाएंगे बहुत न सही
कुछ तो .....
भर पाऊंगा आधी फीस
ले पाऊंगा... बहन की पेंसिल
यही सोचकर..
उसने फिर आवाज़ लगाई....
ले लो...ले लो
पाँच की एक...
बीस की पाँच...
                 -संगीता

Monday, 19 March 2018

आज....

हृदयतल  नम है...
आँखों के साथ,
जो सुना
 वो नया न था,
शाश्वत है जीवन -मरण
सांसरूपी ज्योति
बुझ जाती है बिन हवा तूफान के ,
आज बुझी थी वो ज्योति
एक नन्ही सी परी की 
एक माँ से दूर हुआ था,
 उसके आँचल का सुख....
उस नन्ही परी ने कहा था माँ से
बिन बोले ....
आऊँगी  'माँ' तुम्हें फिर हँसाने,
थाम लेना मुझे,
स्नेहिल बाहों में ....
तुम्हारा अपरिमित वात्सल्य
रहेगा मेरे लिए,
पर, तबतक
न होना उदास...
यही तो है जगत की रीत 
जिसपर हमें चलना है...
                           -संगीता







उथल-पुथल सी 

Sunday, 18 March 2018

आँसू....

इंच- इंच बढ़ती और सिमटती मुस्कान
एकसाथ....
आँखों की भीगी  पुतलियाँ
जानती नही आँसू क्या है...
वो तो भीग जाती हैं
वक़्त- बेवक़्त,
रोता तो दिल है
जो दिखाता नही ....
खारे पानी के सोते
कैद हैं भीतर
जो ढलक आते हैं
हल्की सी चोट पर
वो, हल्की सी चोट
जो, तोड़ देती है
चट्टान को...
                संगीता

Saturday, 17 March 2018

जब कोई छूटता है ....

सब कुछ थाम कर चलने वाला
जब कह दे.…..
मैं थक गया हूँ,
तुम्हें ढोते-ढोते....
पतझड़ में झड़ते पत्तों सा वो,
बिखर पड़े जो राहों में
उस पल...वो
फूटते कोंपलों के बीच
देख नही पाता ...
जीवन की लाली,
भारहीन सा वो....
जिसे सम्भाले फिरती हूँ
उसके लिए मैं ...
गुरु गम्भीर हूँ,
गीले रुई के फाहे के
सूखने का इंतजार ....
या ,
सूखी टहनियों पर
हरे पत्तों के आने की चाह....
                                 -संगीता

Friday, 2 March 2018

मेरे माथे पर लिखा है.....

मेरी  किताबी  उपाधियाँ
कोरे  कागज  सी लगती  हैं मुझे ,
पढ़ डाले कितने  ही  पन्ने
पर, पढ़ न पाई शक्ल की लिखावट,
हर  बार उलझन  बढकर  कहती  है-
'दिल  की सुनो'
पर, दिल  किसी  की सुनता  नही
  दिल  का  कोई  मोल  जमाने  में  नहीं
 उसी दिल  के कारण,
हर कोई  पढ़  लेता  है
सूरत  मेरी,
जिसपर  लिखा है....
'मैं  बेवकूफ  हूँ'
                   -संगीता



अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...