पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो
आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो
अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे
कहने वाले, सुनने वाले,घावों को बहते देखेंगे
घनघोर निराशा के बादल,तुमको न सफल बनने देंगे
पीड़ाओं के ये बढ़ते वन,पथ में कांटे बिखरा देंगे
मिलेंगे बहुत समझाने वाले,चलते-पथ से भटकाने वाले
अपना मन बहलाने वाले, बीच अधर लटकाने वाले
आसान न होगी एक डगर,रुकना नहीं है तुमको मगर
उल्टी धारा में उतरे तो,मौजों की उंगली तोड़ो तो,
यह तुम पर ताने कसने वाले,तुमसे ही मिलने आएंगे
सब राग द्वेष को भूल -भाल, बस एक राग में गाएंगे
संघर्ष शिशिर का सूरज है,जुगनू मन वाले क्या जानें
तुमने जो तप से साध लिया,ये मूल्य कोई क्या पहचाने
तुम शोक -सोच को परे धरो,मन में लिए मशाल बढ़ो
लघुता- जड़ता से निकलो तो,अपनी आभा को परखो तो
सब तूफानों की राह बदल,तुम भीग चुके अब बरसों तो
- डॉ संगीता