Monday, 18 July 2022
कुछ बातें...24
बहुत मुश्किल है दिल को वीरान कर लेना ।बड़ी तकलीफ होती है दिल को खाली करने में जैसे किसी मकानमालिक ने तुरंत घर खाली करने को कहा हो।दिल का आशियाना बनाने सवारने में एक उम्र बीत जाती है और उजड़ने में वक़्त नही लगता।किसी के होने और उसके खोने में बस कुछ ही पल लग सकता है।पर,किसी के होकर भी न होने में कितना कुछ छुपा है।
रूपेश ने एक बार मुड़कर देखा था उसकी ओर शायद आखिरी बार के लिए,पर उसके नजरें आज भी वहीं ठहरी हैं।जैसे उसे अभी भी आस हो कि वो वापस आ जायेगी।किसी न किसी दिन।
-अपनी ही कलम से
Friday, 15 July 2022
कुछ बातें...23
जीवन में कठिनाइयां बहुत है पर उन कठिनाइयों को कठिनाई न समझ कर जीवन के लिए एक संघर्ष समझना चाहिए। जिसके लिए जीते हैं किसी की राहों में रेशम समझ जाना, फूलों की गलियां बन जाना ,आसान नहीं होता। कांटों की चुभन भी स्वीकार करने पड़ते हैं। कोई किसी को रोककर रखना चाहता है तो समझ लो कि वह अपनी सांस रोक कर बैठा है और सांस ज्यादा देर तक रोकी नहीं जा सकती नहीं तो इंसान स्वास मुक्त हो जाता है जिसे जाना है वह जाकर रहेगा जिसे रुकना है वह कभी जाने की बात नहीं करेगा पर यह सारी बातें तृषा के समझ में नहीं आता वह तृषा है अयान की जिंदगी में तृषा की अहमियत कब इतनी बन गई कि अब अहम बीच में आ गया अहम और वहम मन के रोग हैं। जो मन के साथ-साथ शरीर को भी रोगी बना देते हैं ।यह रोग तृषा को भी है जीवन मैं जितनी नीरसता हम भरते जाएंगे उतने ही दुखी होंगे क्योंकि यह दुख सभी दुखों से परे हैं इसकी कोई दवा नहीं प्रसन्न रहना भी इतना आसान नहीं है ,जितना कहना प्रसन्नता माथे के चंदन की तरह तो है जो मन प्रसन्न रखने में कारगर होती है, किंतु जब हृदय और मस्तिष्क दोनों का समन्वय न हो तब घड़ियां बिताना मुश्किल हो जाता है। इसे अयान भी नहीं समझता वह परीक्षा के लिए अपना सब कुछ छोड़कर आगे बढ़ना चाहता है।तृषा उसके लिए अब सोने की जंजीर थी।
-अपनी ही कलम से
Sunday, 3 July 2022
कुछ बातें....22
अंशिका की आवाज की गहराई वह क्या समझे।रत्न मैं....
तुम्हारी तस्वीर बार बार देखती हूँ और हर एक याद से जुड़ती हूँ।तुम चाह कर भी वो लम्हे लौटा नहीं सकते,तो एक
नया लम्हा ही बना दो।कम से कम इसी बहाने तुम साथ तो रहोगे।मुझसे जुड़े तो रहोगे।अंशिका की मनुहार सुने बिना ही रत्न ने उससे मुह फेर लिया।उसे उसके जीवन का नया पड़ाव जो मिल रहा था।उसके लिए तो हर सफर में में एक सराय मिल ही जाता है।उसे कहाँ एहसास है कि सराय घर नही हुआ करते।
मेरे ही कलम से.....
कुछ बातें...21
कुछ चीजें जब इंसान के हाथों से फिसलने लगती हैं तो वह मुठ्ठी को पूरे बल से बंद कर लेना चाहता है।फिर भी फिसलने वाली चीज मुठ्ठी से बाहर आ जाती है।
मेरी ही कलम से....
कुछ बातें....20
आज तुम्हें फर्क नही पड़ता कि मैं तुमसे दूर हो रही हूँ, कल वापस आना पड़ा तो क्या तुम मुझतक पहुँच पाओगे ...?तुम्हारे कदम आगे बढ़ रहे हैं और पीछे के रास्ते मिटते जा रहे हैं।आने वाले दिनों में कोई ऐसा न होगा जो मेरी कमी पूरी कर देगा।वो तुम्हें समझ में आएगा ,पर अभी नही।तुम दूर तक सफर कर लो, हो सकता है कोई बेहतर मिले।अंशुमान को अपने से दूर जाते हुए रागिनी भरे आँसुओं से देखती है।पर,रोक नही सकती।
मेरी ही कलम से......
कुछ बातें ....19
इंसान को मिट्टी में दफन कर दें तो वह मर जाता है।उससे बाहर नहीं आ पाता किंतु बीज मिट्टी में दबकर मरकर नए रूप में मिट्टी के बाहर आ ही जाता है।बीज के आगे हम बौने हैं।या कह सकते हैं न के बराबर भी।धरती के गर्भ से वह सबकुछ बाहर झाँक सकता है ,जो जीना चाहता है ।साँस लेना चाहता है।और फिर मरना है यह भी जानता है।
मेरी ही कलम से.....
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अपनी ओर
पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...