उस क्षण देखो तो ....
स्त्री देह के नरम गलीचे
और ,मन के बवंडर
आत्मा की चीर -फाड़,
चलता है कारोबार, जब
देह के सहारे...
आँखों की मरती हया
लाज के उतरते गहने ,
सब कुछ सह जाने को तैयार
सिली जुबान से ...
वो बारूद जो भर रहा है
गुबारों के गोलों में,
कब आग में बदल जाये
बस,मन के कहने की देर है....
-संगीता
स्त्री देह के नरम गलीचे
और ,मन के बवंडर
आत्मा की चीर -फाड़,
चलता है कारोबार, जब
देह के सहारे...
आँखों की मरती हया
लाज के उतरते गहने ,
सब कुछ सह जाने को तैयार
सिली जुबान से ...
वो बारूद जो भर रहा है
गुबारों के गोलों में,
कब आग में बदल जाये
बस,मन के कहने की देर है....
-संगीता