Sunday, 30 December 2018

कहने की देर है..

उस क्षण देखो तो ....
स्त्री देह के नरम गलीचे
और ,मन के बवंडर
आत्मा की चीर -फाड़,
चलता है कारोबार, जब
देह के सहारे...
आँखों की मरती हया
लाज के उतरते गहने ,
सब कुछ सह जाने को तैयार
सिली जुबान से ...
वो बारूद जो भर रहा है
गुबारों के गोलों में,
कब आग में बदल जाये
बस,मन के कहने की देर है....
                              -संगीता
           



Saturday, 29 December 2018

सिक्के का एक पहलू

सिक्का उछाल दिया था उसने
यह जानते हुए ,
सिक्के के एक पहलू पर हूँ मैं
यह जानते हुए
वह जीत था मैं हार हूँ
यह जानते हुए....
                    -संगीता

Thursday, 20 December 2018

कहो तो

होठ सिले हैं,
कहो तो खोल दूँ।
कतरनों से पड़े रिश्ते को ,
कहो तो जोड़ दूँ।
तुम कहो तो डाल लूँ ,
पैरों में बेड़ियाँ...
कहो तो ,सारी मज़बूरियों को तोड़ दूँ।
साथ न चलने की कोई वजह तो कहो,
वेवजह ही सही ,दुनिया को छोड़ दूँ।
                                  -संगीता


Saturday, 15 December 2018

कब तक

कंधे झुके जाते हैं...
अनदिखे बोझ  से
कदम पहाड़ बन जाते हैं
चलने के नाम से
रिश्तों की भारी गठरी है,
मंजिल है पर राह नही
उग आते हैं राह में शब्दों के काँटे,
शब्द गूँजते हैं पर ,आवाज है नही.....
हो जाती हैं नदियाँ भी खारी,
घूँट भर प्यास देखकर,
 सुलगती है हरियाली भी
चाँदनी रात देखकर....
                        -संगीता


तुम्हारे शब्द ....

तुम्हारे शब्द तुम्हें तोलते हैं,
झूठ नही ,हम सच बोलते हैं...
जब चाहे परख लेना मुझे
हवाओं की तरह हम नही डोलते हैं...
                                  - संगीता

Sunday, 9 December 2018

सीढ़ियाँ....

मन के दहलीज से
भीतर उतरती जाती हैं
कभी न खत्म होने वाली
सीढियाँ....
ठहर कर दरारों को सहलाती
स्पर्श का मरहम लेपती...पर,
तो टूक कह न पातीं
सीढ़ियाँ......
वक़्त की खाई चोट वक़्त पर
भर जायेगी,
दूर आँखों से ,नजर न आयेंगी ये
सीढ़ियाँ......
                -संगीता

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...