Wednesday, 10 October 2018

सच नहीं क्या ये...

जैसे जिंदगी एक तलाश थी
तुम पर आकर रुक गई।
कतरा-कतरा बह रहा तूँ
रग-रग में जैसे ....
शाम ए जिंदगी की बाती
तुमसे मिलके जल उठी।
                      -संगीता


Friday, 5 October 2018

उँगलियाँ महक उठी

चलते-चलते यूँ ही हौले से
छूकर गुजर गया कोई ....
बिन बात किए ,सब मन मे लिए
मुस्कान सा बिखर गया कोई ....
 तितलियों की रंगीनी उधार लेकर
गुलाल सा बनता रहा कोई ....
खिलते गुलाब की पंखुड़ी पकड़कर
 खुशबू सा महकता रहा कोई.....
उदासियाँ मेरी जाम में मिलाकर
घूँट-घूँट जब -तब पीता रहा कोई ....
रखकर मुझको बेखबर जमाने से
मौन से जज्बात जताता रहा कोई...
जिसे जान न सकी खुली निगाह मेरी
मुझे बन्द आँखों से भी  पहचानता है कोई ...
वक़्त -बेवक़्त छूट जाता है हर लम्हा
कानों में सरगोशियों सा ठहरा हुआ है कोई ....
उँगलियों में  महक है आज भी अनजानी सी
नजर है हर तरफ ...पर दिखता ही नहीं है कोई.....
                                                   -संगीता


अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...