Sunday, 29 March 2020

जी करता है

आजकल खामोशियों के पर निकल आये हैं,
मनभावन सी डाल बैठने की चाह है।
सीधे -साधे से दो लफ्ज़ की बातें,
बातों ही बातों में कहने की चाह है।
मन की अमराई में कोयल की कूकें,
मन ही मन कोई सुन ले ,ये चाह है।
पैर पसारती जड़ता को चेतन जो कर दे,
ऐसे अनुरागी को छूने की चाह है।
                                   -  Sangita 

Saturday, 28 March 2020

फिर से....

आज मिल गया था कुछ
दबा-दबा सा किताब से
छूकर  देखा तो
 वो एक लम्हा था।
वही लम्हा आज फिर
जीने को दिल करता है,
बरसों पहले सा
दिल जोर से धड़कता है।
उम्र का फासला
तय कर लूँ दिल करता है।
आज फिर अंतर का
सागर उमड़ता है।
आज फिर....
              -संगीता
                

Tuesday, 17 March 2020

एक सी शक्लें..

तकलीफों के दामन में
काटों की किस्म -किस्म की शक्लें
पर,चुभते एक से हैं।
हर कहीं देखा,
दर्द की भरी दुकान में,
 कोई भी दर्द मीठा नही होता।
भर जाती है झोली
बिन मांगे...
दामन अपने -अपने हैं
काटें भी अपने -अपने
                   -संगीता


अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...