Wednesday, 18 April 2018

तुमने...

जीवन कितना रीता था.…
तुम्हारे न होने से ,
एक किलकारी ने
भर दिया था जहाँ सारा
खिलती दो दतियाँ
छिपने लगीं होठों के बीच,
बिखरती मुस्कान के पीछे
मुश्किलों से  लड़ना...
तुम कब सीख गए
प्रेषित कर देते हो खुशियाँ...
दूसरों के दुख सुनकर,
तुममें इतनी विशालता
कहाँ से आई ...
                    -संगीता
             


Monday, 16 April 2018

एक नाम...

ज्यादा दिन नही हुए
कुकृत्य ने करवट बदली
हर करवट पर दम घुटा
विदीर्ण लोहित काया लिए
सिसकती रही मानवता
इतिहास बन रहा है
पशुता का ....
 आसिफा  को भूलने में
वक़्त कहाँ लगेगा,
वासना के बाजार में
 कोई और  क्यूँ  .... ?
नीचता का प्रगति चक्र घूम रहा है..
रोशनी को बुझाए,
द्वार पर
आहट सुनाई दी........?
                               -संगीता

Wednesday, 11 April 2018

जीवन में तुम

कल्पनाओं के बादल लेकर उड़ती मैं
छू लेती हूँ ...
आसमानी चादर ...
बादल में कैद आँखों की नमी
बरसना चाहती है
सूखी जमीन पर,
लहलहा उठे हरियाली
बसन्ती फूलों के संग,
मधुरिमा के बीच
हथेली से सरकते क्षणों ने
मोड़ा जब,
तब....
भुलावे के संसार से निकल
जो खुरदुरे पथ मिले
यथार्थ की भूमि
तुम ही तो थे....
                     -संगीता

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...