Friday, 30 November 2018

वो हवाओं का असर था...

महफिलों में जो तन्हा कर देते थे
वो दिल को महफ़िल कहते हैं...
कहते हैं वो दिल पर दस्तक देकर,
आता-जाता नही क्या कोई इधर से ...
हवाओं का रुख ही था ....
जो वो साथ-साथ उड़ते थे,
पर कटने से वो अब नजर नही आते ...
उनकी बातों में थी हजार कोशिशें,
 पहुँचे जो रूह तक ,
ऐसे तो कोई अल्फ़ाज़ न थे ...
 हवाएं ही हैं जो बिना ही दिखे
अपनी छुअन से मदहोश से कर दे
वो असर जो था वो हवाओं का था
इतनी शिद्दत में अरमान तो न थे ...
                                 -संगीता

Sunday, 25 November 2018

तराशते हुए...

कुछ खरोंचे हैं मन -बदन पर
तुम्हें जो दिखती हैं
वो लकीरें खिंची हैं ...
ढाल रही है जिंदगी
अपने हिसाब से
बेढब पत्थर सी वो
पड़ी मिली थी...
परिस्थितियों की छोटी -बड़ी छेनियाँ
मार उसकी गुरु -गम्भीर थी
आहत होती थी
बाहर -भीतर से भी
उभरता था कुछ गहरे सवाल सा
जबाब सिर्फ हथौड़ी की मार थी...
तराशती है जिंदगी
सँवारती है जिंदगी
वो बुत बनी,
 पुकारती है जिंदगी..
पत्थर में धड़कता दिल
होठों की मुस्कान...
सब कुछ सजीव सा
थी तो पत्थर ही ..
पर , अब नुमाइश की चीज थी...
                               -संगीता



Thursday, 15 November 2018

खुद में खोई दुनिया

भीड़ में भी
अकेला हुआ इंसान
उसको तो खुद की नही पहचान
रूठ जाते हैं अपने ही
परायों की किसको है परवाह
जोड़कर हृदय से हृदय का नाता
तोड़ देता है  कोई विश्वास
                       -संगीता

Tuesday, 13 November 2018

बिखरे हुए ...

जज्बातों के समंदर में
गोते खाता दिल
भँवरों में  घूमते हुए भी
तुमसे जाता मिल
अलसाए सब बाग -वन
तुम बिन बैरन दिन-रात
करते हैं कोलाहल पंछी
खुशियों की नही सौगात
बिखरी हुई अनगिनत उलझन
तुम बिन कैसे सुलझाऊँ
दिल को तो समझा सकती हूँ
तुमको कैसे समझाऊँ
                         -संगीता

Monday, 12 November 2018

आज..

आज फिर आईना अपना सा लगता है
हर खुशी ,हर गम को 
सहेजता है वो ...
वक़्त-बेवक़्त ढलकते आँसुओं को
देखा है उसने ...
अधरों के बीच चमकते मोतियों को 
महसूस किया है उसने...
अक्स उभर आता है उसमें जब 
एक रूप धर लेता है वो ...
हर दर्द , हर रूप
 हर सिहरन ,हर गति को 
पहचानता है वो...
आँखों के बढ़ते काले घेरों को देख 
बेवश सा हो जाता है वो...
तन की होती दोपहर में 
मन की ढलती शाम गुजरते ,
रात नजर आता है वो....
एकाकी इस जीवन में 
बस....नजर आता है वो...
फिर, आँखों में नन्हें दीपक सा 
कहीं जल जाता है वो..... 
                           -संगीता



घिर रही हैं घटाएं....

खुद को तलाशते -तलाशते
जा पहुँचा मन किस खोह में...
अन्तर्मन की गलियाँ भूली 
जा बैठा किस गेह में ...
घिरती हैं घटाएँ काली 
भीगे न मन बरसात में...
निर्बन्ध हो घूमना चाहे 
जाने किस संसार में...
है बैरागी तन और मन,
क्या ...तुम्हें पाने की आस में....
                         -संगीता

Saturday, 10 November 2018

हथेलियों पर ...

वो जो खिड़कियों की रोशनी से ,
छनकर आ जाता था वक़्त-बेवक़्त
उसकी मौजूदगी महसूसती साँसे,
उतरती जाती थीं गहरे कहीं...
बूँद-बूँद के संगीत को,
 सुन लिया था जिसने ...
रोक लिया था जिसने,
 तूफान अपनी आँखों में...
वो बह गया था नीर सा देखने से ही ,
मर्यादाओं की कँटीली राह जिसने
लाँघी ही नही ...
वो डोलता रहा दो तराजुओं के बीच ,
उसकी हथेलियों पर निशान बनते गए
जो उसके  लिए न थी....
कितनी शिद्दत से उकेरता था
किसी को जिस्म पर ...
वो नाम फिरभी उसकी पहचान तो न थी ,
हर बात हँसकर वो मानता रहा ,
उसकी जबान पर कोई जुबान न थी ...
सो गया था वो जिसकी आगोश में ,
कैसे कहें... उसकी मोहब्बत
कब्रगाह  सी थी...
                    -संगीता




Friday, 9 November 2018

कुछ किया नही....

कटोरों में खनकते चंद सिक्के
शोर जोर की करते हैं....पर,
दिन भर झुलसाती धूप के कानों तक
जूं नही जाती ।
भरे कटोरे के साथ,
देखा नही उसे कभी
हथेली भर पाँव वाले के हाथ
पसरते हैं  एक आस में .....
दुत्कार की रोटी
अपमान का निवाला
गले उतारना
वह सीखता है....
सीख नही पाता वह
भूख को सुलाना
अंधी आँखों का रौशन जहाँ
बुझ जाता है हल्की सी फूँक से
फिर.... खनकता कटोरा ....
और हमने ...
कुछ किया ही नही ....
                       -संगीता


Tuesday, 6 November 2018

यही तो है

जब शब्दों का जाल बनाया उसने
तब...
शब्दों का धार बनाया मैंने ....
जीवन को दिए उसने दोराहे
उसे....
चौराहे पर बिठाया मैंने....
वो कहता है सब मेरा है,
अपना उसे बताया मैंने....
शब्द ये मेरे ,
मेरी दुनिया ...
अब तक,
 पूँजी यही बनाया मैंने....
                       -संगीता

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...