बेहद नाजुक सा हो जाता है दिल मेरा जब तुम्हें देखती हूँ
वरना मेरे दिल सा सख्त कोई चीज़ मैंने नहीं देखा
तुम कहते हो मुझे अपनी आरज़ू,तो आरज़ू की शक्ल में मुझे ही देखना
कर लेना जितना भी गुस्सा करना होगा,पर प्यार भी मुझी से करना
ख्वाब तुम्हारे मुझसे जुड़े थे किस कदर जरा अपने पीछे मुड़ के देखना
अपनी शिद्दत को ढूढ़ना जितनी मुझसे रखते थे
और,पूछना उससे वो कैसे कम हो गई मेरे लिए
आगे बढ़ने की चाहत में कितने दूर निकल आए
कोई पीछे छूट गया तुम्हारे साथ चलते -चलते
कभी बाँध कर नहीं रखना मुझे तुम्हारे दिल के परिंदे को
पर,मेरी डोर जुड़ी है तुमसे ये याद रख सको तो रखना
मेरी शिकायतें,मेरा रोना तुम्हारे ही आगे क्यों है ये सोच सको तो सोचना
तुम्हें तो मुझसे जुड़े ज़ज्बात पढ़ने की फुर्सत नहीं ,कोई बात नहीं
बस याद कर सको तो अपनी बातों अपनी कसमों, वादों को करना
मैं कल भी वही थी आज भी वही हूँ पर,कल शायद वही न रहूं
मेरे दिल को पूरी तरह पत्थर न बना देना
कि धड़कना ही भूल जाए तुम्हारे नाम पर ....
Dr. SANGITA