सुनकर न सुनने वाली वो बात
साँसों से लड़ रही थी
एक नन्ही सी जान
सिसकियों में लिपटी
वो माँ तो न थी
फिर भी शिला वो
तरल हो रही
सुन लो जरा
वो ,कुछ तो कह रही ....
चट्टानों का दिल भी
तरल हो उठा
-डॉ० संगीता
पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...