उसकी हँसी के आगे
वारी थी जिसने दुनिया
थी आज चुप हो बैठी
बातों की जो थी मलिका
खाली हथेलियों के बीच
कुछ तो भरा था...
भरी झोलियों में आज
कुछ भी न मिला था।
हाथों की लकीरें
उसको यूँ ही छूते-छूते
बन ही गई हैं माथे की लकीरें
डॉ०संगीता
पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...
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