Sunday, 25 November 2018

तराशते हुए...

कुछ खरोंचे हैं मन -बदन पर
तुम्हें जो दिखती हैं
वो लकीरें खिंची हैं ...
ढाल रही है जिंदगी
अपने हिसाब से
बेढब पत्थर सी वो
पड़ी मिली थी...
परिस्थितियों की छोटी -बड़ी छेनियाँ
मार उसकी गुरु -गम्भीर थी
आहत होती थी
बाहर -भीतर से भी
उभरता था कुछ गहरे सवाल सा
जबाब सिर्फ हथौड़ी की मार थी...
तराशती है जिंदगी
सँवारती है जिंदगी
वो बुत बनी,
 पुकारती है जिंदगी..
पत्थर में धड़कता दिल
होठों की मुस्कान...
सब कुछ सजीव सा
थी तो पत्थर ही ..
पर , अब नुमाइश की चीज थी...
                               -संगीता



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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...