Tuesday, 18 September 2018

बेहतर तो नहीं....

अपनी जमीं भर के लिए आसमाँ ढूंढ़ना
टूटते पत्तों से हालात पूछना,
काफी तो नहीं....
खुल गई किवाड़ ,
पर आना निषेध है....।
गिरे थे जहाँ से
वो,भावों का शिखर था
संभल गए जहाँ,
वहाँ अपना कोई रहा.....।
सच को सिरे से नकारती,
हर नजर में अंगुलियाँ छुपी हुई रही....
मिलते ही नजर,
 सब मेरी ही ओर थी.....
                         -संगीता


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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...