Friday, 1 February 2019

ये रंग ...

कल्पनाओं के पंखों से उतर
जमीनी कैनवास पर
बोलते हुए से
ये उड़ते रंग,
बिखरना चाहते हैं....
ऊँगलियों को पकड़
मन के अंधियारे से निकल
रोशनी की चादर ओढ़े
इस फलक पर ,ये रंग
निखरना चाहते हैं....
डालियों पर झूलते हुए
मुस्काते फूलों से निकल
मुरझाने से पहले ,ये रंग
जी भर सँवरना चाहते हैं....
                         -डॉ०संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...