अवसादों की बनती चट्टानें,
कभी तोड़ी न जा सकेंगी
ऐसा लगता है,
जो खाई बन रही है
खुद के ही भीतर ,
वो खाई ही रहेगी ,
ऐसा लगता है
मुस्कुराहटें बिखेरती
होठों का खिलना
हर बात छुपा जाता चेहरा
जो दुनिया से परे
अपनी दुनिया में जीता है
यूँ ही नही,
दुनिया कहती है-
खुशनसीबी कदम चूमती है...
डॉ० संगीता
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