Wednesday, 23 October 2019

दुनिया कहती है

अवसादों की बनती चट्टानें,
कभी तोड़ी न जा सकेंगी
ऐसा लगता है,
जो खाई बन रही है
खुद के ही भीतर ,
वो खाई ही रहेगी ,
ऐसा लगता है
मुस्कुराहटें बिखेरती 
 होठों का खिलना 
हर बात छुपा जाता चेहरा
जो दुनिया से परे 
अपनी दुनिया में जीता है
यूँ ही नही,
दुनिया कहती है-
खुशनसीबी कदम चूमती है...
                     डॉ० संगीता

 

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...