Thursday, 24 October 2019

हाँ ...तुम

नवनीत सी पथ मैं 
और गतिअवरोधक से तुम 
तकलीफों की इस राह से 
गुजरता हर लम्हा 
सख्त करता है मुझे 
और सिमटते हो तुम ...
हाँ ...तुम
         -डॉ०संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...