Tuesday, 22 October 2019

देखा है क्या...

जिनके तन पर
चंद कपड़ो की कतरने झूलती हैं,
नन्हे-नन्हे उँगलियों की
ढीली पड़ती पकड़ ...
सांसो को  ,हवा यूँ उड़ाना चाहती है,
विवशता के शिखर  चढ़ती वो 'माँ'
अपने लाडले का यूँ
मुख चूमती है,
रह-रहकर वो
माथे की शिकन
हथेलियों में देखती है...
देखा है क्या...?
       -डॉ० संगीता




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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...