Thursday, 4 January 2018

कविता

मधुप की गुंजार सा जो
 घुल रहा था कान में ..
आज उसने ..
विष की बूंदे
घोल दी संसार में
हो समर्पित स्नेह से
झुक गया था....जो राह में
आज बन अवरोध सम
बिछ गया है ,
मार्ग में ....
अवसाद की चट्टान पर
कितने परत उसी से हैं,
वो आज भी ,
कुंठित भाव से
ढेर बनाता है ....
दुर्विचार के ,
त्राहि- त्राहि करते....
 मन- प्राण
जिसके होने से झुलसते हैं
अग्नि के ताप  सम
उसकी महिमा,
अदृश्य दाहक शक्ति
जलाती है देह ...पर,
मरती है सम्वेदना
यह ....द्वेष
यह ....ईर्ष्या
नही ,दिलाते मुक्ति
बिना ....त्याग के
                   -संगीता





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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...