करती हैं मनुहार ,
ये ,ऋतुएँ बार -बार
कोई तो सुने....
हर रूप में
हर साज में,
खड़ी हैं ,
कबसे
राह में,
उत्स हैं, ये ही
जिसके आनंद का
इनसे ही देवत्व,
इनसे मुख मोड़ता
हठधर्मी ये मानव
करता है प्रहार
प्रकृति के ममत्व पर,
विमुखता की पराकाष्ठा पर
आसीन ये ,
मनुवंशी
पुकार नही सुनते
कोमल हृदय का
कबतक करेंगी,
मनुहार ,ये ऋतुएँ
छीन लेंगी,
सबकुछ
जितना भी दिया,
मूल में है ,जो..
रहस्यमयी रश्मियां
उनका आकर्षण
चुम्बकीय स्पर्श
तुम्हें ,
मिलेगा......?
-संगीता
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