Friday, 2 February 2018

कैसा लगता है...

सौंदर्य सुषमा से सम्पन्न
गोलाकार धरा की
अनगिनत  आँखें
तुम्हें निहारती है...
अनुरागी चित्त की
अतुलित कल्पनाएँ
तुममें साकार होती हैं।
तुम्हारा उभरता बिम्ब
टूटती वर्जनाएं
एकसाथ
तुम ,इस पार भी
उस पार भी
पूरी दुनिया का
अधूरा अस्तित्व
सोलहों कलाओं की
 एक साथ  अनुपस्थिति
कहीं तुम ही तुम हो
कहीं हो ही नही
ग्रहण की कालिमा में
उजला, मुक्त होता
निर्जीव तन
अनुपम ..तुम्हारा रूप
सूर्य की शीतलता के राग तुम
उसी की दाहकता में
दमकता तुम्हारा
चाँदी सा वदन
देखकर
तुम्हें ,अनन्त स्पर्श करता है
अमृतकलश वाहक
ज्योति का स्पंदन
भावनाओं का तन्तु
जुड़ा है तुमसे
तुम्हें कैसा लगता है ...?
                              -संगीता

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