Friday, 2 February 2018

हाँ

अनुपम हो तुम
श्रृंगार ,
हर्ष-विषाद 
भक्ति -वात्सल्य
अनुराग -विराग 
काम -मोक्ष 
रसयुक्त -रसहीन
मूल्यों का संचालन तुमसे
जीव ...निर्जीव ..तुम बिन
तुम्हारा साम्राज्य
तुम्हारी अलौकिक क्षमता 
जगत से परे 
असीमित विस्तार  मनों पर 
तुम्हारे दोनों पहलू 
प्रतीक्षा-परिणति
क्षणिक सुखदायी 
दीर्घ दुखदायी
फिर भी ,
तुमसे आबद्ध हैं हम।
                              -संगीता 
                           

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...