Saturday, 3 February 2018

गहनतम हो ...

घिरती अंधियारी सी
काले बादलों का शोर
कड़कती तेज ध्वनि के बीच
कुछ प्रकाशमय सा
ढूंढ लेता है  मुझको
और ,बता देता है
कालिमा में छिपे
उजाले का रहस्य
जहाँ,
अगोचर सी दीप्ति की
निरन्तरता
ओढ़ लेती है
गुरु- गहन-गम्भीरतम
आपात के क्षण को
                        -संगीता


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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...