Saturday, 24 February 2018

जो लिखा था ....

उतर आया पन्नों पर
जो तैरता था आँखों में,
किसी बंद  लिफाफे सा
खुल  गया था वो,
कोरे  कागज  पर
पानी की लिखावट को
पढ़ लिया था उसने,
किस्मत  की
 एक दूसरे को काटती रेखाँए
अबूझ भाषा सी ये लकीरें
पढ़ी नही जाती उससे भी....
                                   -संगीता


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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...