Sunday, 25 February 2018

वो रोके न रुका....

दसों द्वार पर
पहरा लगा बैठी थी, 
वह छूकर गुजर गया
जैसे वो हवा हो, 
उसके  होने में न होना
विराग  जगाता है,
                    -संगीता  

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...