दसों द्वार पर
पहरा लगा बैठी थी,
वह छूकर गुजर गया
जैसे वो हवा हो,
उसके होने में न होना
विराग जगाता है,
-संगीता
पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...
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