Sunday, 11 February 2018

ऐसा है वो

तुम्हारे सवालों में
जबाब बनकर
बहते सैलाब में लोहे सा पिघलकर,
जीत लेता है वो
समर सारे
पर, हार जाता है
तुम्हारे नेत्रबाण से
ओस के बूँद सा
 बिखरता है गीले बालों में ,
सुख- दुःख की हर घड़ी में
आता है नजर वो
आँखों के कोने में ,
प्रेम की पराकाष्ठा पर
जा पहुँचा है वो
अगम-अगोचर सा
रहता है मन से परे
पर सुन सकता है वो
हृदय का हर स्पंदन
तुम्हारे लिए ईश का
दूसरा नाम है वो ....
तुम्हारे लिए सुबह भी
शाम भी वो
              - संगीता

No comments:

Post a Comment

अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...