तुम्हारे सवालों में
जबाब बनकर
बहते सैलाब में लोहे सा पिघलकर,
जीत लेता है वो
समर सारे
पर, हार जाता है
तुम्हारे नेत्रबाण से
ओस के बूँद सा
बिखरता है गीले बालों में ,
सुख- दुःख की हर घड़ी में
आता है नजर वो
आँखों के कोने में ,
प्रेम की पराकाष्ठा पर
जा पहुँचा है वो
अगम-अगोचर सा
रहता है मन से परे
पर सुन सकता है वो
हृदय का हर स्पंदन
तुम्हारे लिए ईश का
दूसरा नाम है वो ....
तुम्हारे लिए सुबह भी
शाम भी वो
- संगीता
जबाब बनकर
बहते सैलाब में लोहे सा पिघलकर,
जीत लेता है वो
समर सारे
पर, हार जाता है
तुम्हारे नेत्रबाण से
ओस के बूँद सा
बिखरता है गीले बालों में ,
सुख- दुःख की हर घड़ी में
आता है नजर वो
आँखों के कोने में ,
प्रेम की पराकाष्ठा पर
जा पहुँचा है वो
अगम-अगोचर सा
रहता है मन से परे
पर सुन सकता है वो
हृदय का हर स्पंदन
तुम्हारे लिए ईश का
दूसरा नाम है वो ....
तुम्हारे लिए सुबह भी
शाम भी वो
- संगीता
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