मैं दूर का प्रेमी हूँ
तुम्हारे पास रहता हूँ
उपहार देता हूँ तुम्हें
पर,जानता नही उपहार को
नन्हें-नन्हें, रंग-बिरँगे
भालुओं के भोलेपन में
जब तुम खो जाती हो
जब तुम्हारा रोम-रोम
खिल कर कुछ कहता है,
उछलकर,
'थैंक्यू 'में गोल होते तुम्हारे होंठ,
साथ में एक शरारती सी मुस्कान
जब छू लेती है
मेरे गालों को
सितारे सी चमकती आँखों को
जो मिलता है
उसे मैं अपना उपहार समझता हूँ
दिल करता है
काश ..मैं होता
मखमली निष्प्राण
रंगीन छोटे भालू सा
या ...होता मुलायम खरगोश सा...
तुम मझे पाकर
झूम जाती
बार -बार चूमती मुझे
मुझे सीने से लगाकर सोती
दिन- रात मुझसे बातें करती
भले रूठ जाती दुनिया से
पर, मुझपर प्यार लुटाती
मेरी समझ से परे तुम
खुद ही बता दो
क्या ....चलते -फिरते काले भालू से
इतना ही प्रेम जताती....?
अब भी यही सोचता हूँ
काश....मैं....
संगीता
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