Saturday, 31 March 2018

तुम...

जब भी कोई बोझ उठाया न गया
तुम्हारे कन्धे पर डाल दिया
लाचार किसी को जब देखा
तुमने कन्धे का बढ़ा  दिया
झूल जाता है जो कोई
तुम्हें पकड़,
उसके भावों को तुमने सर चढ़ा लिया,
प्रेम के पिंघे मार -मार
हर ओर जो कन्धा झुका दिया ,
दुनिया के गम भी दूर हुए
आँखें भी जीभर रो डाली
तुमने जो,  सर कन्धे से टिका दिया...
जीवन की अंतिम यात्रा में
कन्धे ने  ही है भार सहा….
फिर ढूँढता है तुम्हें कोई ,
तुम्हारे कांधे की विशालता
तुम क्या जानो
मैंने सदा ...
तुमसे बढ़कर माना इसको
जिसने पग -पग पर सबका साथ दिया....
                                                 -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...