Wednesday, 28 March 2018

हकीकत कुछ और है......

थक जाती हूँ.....
मुस्कुरा कर हर रोज
सच्ची मुस्कान गुम सी है..
खुद से ही करती हूँ हजार बातें
आवाज कोई मेरी सुनता ही नही....
पढ़ लेती हूँ
मन के कोरे कागज भी
जिन्दगी ने न जाने कब,
पढ़ना सिखा दिया...
खंजर सी चुभती बातें मुझे
तरस गए है कान मिठास के लिए....
                                         -संगीता




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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...