Wednesday, 18 April 2018

तुमने...

जीवन कितना रीता था.…
तुम्हारे न होने से ,
एक किलकारी ने
भर दिया था जहाँ सारा
खिलती दो दतियाँ
छिपने लगीं होठों के बीच,
बिखरती मुस्कान के पीछे
मुश्किलों से  लड़ना...
तुम कब सीख गए
प्रेषित कर देते हो खुशियाँ...
दूसरों के दुख सुनकर,
तुममें इतनी विशालता
कहाँ से आई ...
                    -संगीता
             


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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...