Monday, 16 April 2018

एक नाम...

ज्यादा दिन नही हुए
कुकृत्य ने करवट बदली
हर करवट पर दम घुटा
विदीर्ण लोहित काया लिए
सिसकती रही मानवता
इतिहास बन रहा है
पशुता का ....
 आसिफा  को भूलने में
वक़्त कहाँ लगेगा,
वासना के बाजार में
 कोई और  क्यूँ  .... ?
नीचता का प्रगति चक्र घूम रहा है..
रोशनी को बुझाए,
द्वार पर
आहट सुनाई दी........?
                               -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...