Tuesday, 17 July 2018

मन में आया

कदमों को रोकता था
मन को खींचता था
मुड़ जाना चाहती थी उम्मीदें मेरी
लौट जाती थी तरंगें सभी
जान गई उसको
पहचान गई उसको
वो, कोई और नहीं
राह का काँटा था.....
                           -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...