चलती रही सपनों की राह पर
नन्हे-नन्हे कदमों के भारीपन बढ़ता रहा
थम गई सीमा पैरों के बढ़ने की
पर, कदम रुकते नही
खींच लेती हूँ आँख पर पड़े पर्दे
हार की हर राह में
ओढ़ लेती हूँ उम्मीद की चादर
कालिमा के बीच उड़ता है
कोई, जुगनू सा
तोड़ लूँगी एक दिन
सब्र का वो फल
विश्वास मेरे साथ बस
चलता रहे..…..
-संगीता
नन्हे-नन्हे कदमों के भारीपन बढ़ता रहा
थम गई सीमा पैरों के बढ़ने की
पर, कदम रुकते नही
खींच लेती हूँ आँख पर पड़े पर्दे
हार की हर राह में
ओढ़ लेती हूँ उम्मीद की चादर
कालिमा के बीच उड़ता है
कोई, जुगनू सा
तोड़ लूँगी एक दिन
सब्र का वो फल
विश्वास मेरे साथ बस
चलता रहे..…..
-संगीता
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