आज फिर आईना अपना सा लगता है
हर खुशी ,हर गम को
सहेजता है वो ...
वक़्त-बेवक़्त ढलकते आँसुओं को
देखा है उसने ...
अधरों के बीच चमकते मोतियों को
महसूस किया है उसने...
अक्स उभर आता है उसमें जब
एक रूप धर लेता है वो ...
हर दर्द , हर रूप
हर सिहरन ,हर गति को
पहचानता है वो...
आँखों के बढ़ते काले घेरों को देख
बेवश सा हो जाता है वो...
तन की होती दोपहर में
मन की ढलती शाम गुजरते ,
रात नजर आता है वो....
एकाकी इस जीवन में
बस....नजर आता है वो...
फिर, आँखों में नन्हें दीपक सा
कहीं जल जाता है वो.....
-संगीता
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