खुद को तलाशते -तलाशते
जा पहुँचा मन किस खोह में...
अन्तर्मन की गलियाँ भूली
जा बैठा किस गेह में ...
घिरती हैं घटाएँ काली
भीगे न मन बरसात में...
निर्बन्ध हो घूमना चाहे
जाने किस संसार में...
है बैरागी तन और मन,
क्या ...तुम्हें पाने की आस में....
-संगीता
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