Monday, 12 November 2018

घिर रही हैं घटाएं....

खुद को तलाशते -तलाशते
जा पहुँचा मन किस खोह में...
अन्तर्मन की गलियाँ भूली 
जा बैठा किस गेह में ...
घिरती हैं घटाएँ काली 
भीगे न मन बरसात में...
निर्बन्ध हो घूमना चाहे 
जाने किस संसार में...
है बैरागी तन और मन,
क्या ...तुम्हें पाने की आस में....
                         -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...