Friday, 30 November 2018

वो हवाओं का असर था...

महफिलों में जो तन्हा कर देते थे
वो दिल को महफ़िल कहते हैं...
कहते हैं वो दिल पर दस्तक देकर,
आता-जाता नही क्या कोई इधर से ...
हवाओं का रुख ही था ....
जो वो साथ-साथ उड़ते थे,
पर कटने से वो अब नजर नही आते ...
उनकी बातों में थी हजार कोशिशें,
 पहुँचे जो रूह तक ,
ऐसे तो कोई अल्फ़ाज़ न थे ...
 हवाएं ही हैं जो बिना ही दिखे
अपनी छुअन से मदहोश से कर दे
वो असर जो था वो हवाओं का था
इतनी शिद्दत में अरमान तो न थे ...
                                 -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...