महफिलों में जो तन्हा कर देते थे
वो दिल को महफ़िल कहते हैं...
कहते हैं वो दिल पर दस्तक देकर,
आता-जाता नही क्या कोई इधर से ...
हवाओं का रुख ही था ....
जो वो साथ-साथ उड़ते थे,
पर कटने से वो अब नजर नही आते ...
उनकी बातों में थी हजार कोशिशें,
पहुँचे जो रूह तक ,
ऐसे तो कोई अल्फ़ाज़ न थे ...
हवाएं ही हैं जो बिना ही दिखे
अपनी छुअन से मदहोश से कर दे
वो असर जो था वो हवाओं का था
इतनी शिद्दत में अरमान तो न थे ...
-संगीता
वो दिल को महफ़िल कहते हैं...
कहते हैं वो दिल पर दस्तक देकर,
आता-जाता नही क्या कोई इधर से ...
हवाओं का रुख ही था ....
जो वो साथ-साथ उड़ते थे,
पर कटने से वो अब नजर नही आते ...
उनकी बातों में थी हजार कोशिशें,
पहुँचे जो रूह तक ,
ऐसे तो कोई अल्फ़ाज़ न थे ...
हवाएं ही हैं जो बिना ही दिखे
अपनी छुअन से मदहोश से कर दे
वो असर जो था वो हवाओं का था
इतनी शिद्दत में अरमान तो न थे ...
-संगीता
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