मन के दहलीज से
भीतर उतरती जाती हैं
कभी न खत्म होने वाली
सीढियाँ....
ठहर कर दरारों को सहलाती
स्पर्श का मरहम लेपती...पर,
तो टूक कह न पातीं
सीढ़ियाँ......
वक़्त की खाई चोट वक़्त पर
भर जायेगी,
दूर आँखों से ,नजर न आयेंगी ये
सीढ़ियाँ......
-संगीता
भीतर उतरती जाती हैं
कभी न खत्म होने वाली
सीढियाँ....
ठहर कर दरारों को सहलाती
स्पर्श का मरहम लेपती...पर,
तो टूक कह न पातीं
सीढ़ियाँ......
वक़्त की खाई चोट वक़्त पर
भर जायेगी,
दूर आँखों से ,नजर न आयेंगी ये
सीढ़ियाँ......
-संगीता
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