Sunday, 9 December 2018

सीढ़ियाँ....

मन के दहलीज से
भीतर उतरती जाती हैं
कभी न खत्म होने वाली
सीढियाँ....
ठहर कर दरारों को सहलाती
स्पर्श का मरहम लेपती...पर,
तो टूक कह न पातीं
सीढ़ियाँ......
वक़्त की खाई चोट वक़्त पर
भर जायेगी,
दूर आँखों से ,नजर न आयेंगी ये
सीढ़ियाँ......
                -संगीता

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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...