Sunday, 30 December 2018

कहने की देर है..

उस क्षण देखो तो ....
स्त्री देह के नरम गलीचे
और ,मन के बवंडर
आत्मा की चीर -फाड़,
चलता है कारोबार, जब
देह के सहारे...
आँखों की मरती हया
लाज के उतरते गहने ,
सब कुछ सह जाने को तैयार
सिली जुबान से ...
वो बारूद जो भर रहा है
गुबारों के गोलों में,
कब आग में बदल जाये
बस,मन के कहने की देर है....
                              -संगीता
           



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अपनी ओर

 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...