सर्द रातों में बर्फ सा
जम जाता है वो,
किसी कुंद अवसाद सा ,
पिघलता ही नही गर्मजोशी से भी...
वो पत्तों पर ठहरता है ....
-संगीता
जम जाता है वो,
किसी कुंद अवसाद सा ,
पिघलता ही नही गर्मजोशी से भी...
वो पत्तों पर ठहरता है ....
-संगीता
पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे...
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